एक तरफ अमेरिका भारत से व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने में जुटा है, दूसरी ओर वह रूस से तेल खरीदने पर सौ फीसद आयात शुल्क लगाने की तैयारी कर रहा है। व्यापारिक रिश्तों में विरोधाभास का यह विचित्र उदाहरण है। दरअसल, अमेरिका के दोनों प्रमुख दलों के सांसदों के एक समूह ने सीनेट में एक विधेयक पेश किया है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले भारत और चीन सहित पांच देशों पर सौ फीसद तक आयात शुल्क लगाने का प्रस्ताव है।
इस विधेयक के पारित हो जाने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भारी-भरकम शुल्क थोपने का अधिकार मिल जाएगा। इस नए परिदृश्य में भारत-अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ता का क्या भविष्य होगा, यह एक बड़ा सवाल है और फिर समझौते का भी क्या महत्त्व रह जाएगा?
गौरतलब है कि बीती फरवरी में व्यापार समझौते के लिए रूपरेखा तय होने पर रूसी तेल से जुड़े अतिरिक्त पच्चीस फीसद शुल्क को हटा दिया गया था। अब नए सिरे से सौ फीसद शुल्क लगाने की प्रक्रिया से प्रतीत होता है कि अमेरिका भयादोहन की नीति अपना रहा है।
हालांकि, संशोधित विधेयक को पहले के मसविदे से नरम बताया जा रहा है। शुरुआती प्रस्ताव में ट्रंप प्रशासन ने संसद में विधेयक पेश कर पांच सौ फीसद तक शुल्क लगाने की पेशकश की थी। मगर सवाल है कि कोई देश अगर रूस से तेल खरीदता है, तो उस पर अमेरिका को शुल्क लगाने का अधिकार कैसे मिल जाता है!
ईरान पर हमले से लेकर शुल्क थोपने तक के मुद्दे पर जिस तरह से राष्ट्रपति ट्रंप अपने रुख से पलटते रहे हैं, उससे अमेरिका की साख कम हुई है। यह स्पष्ट है कि दूसरे देशों को मनमाने तरीके से संचालित करने और उन पर नाहक दबाव बनाने से अमेरिका की महाशक्ति की छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। दबाव बनाने और अपने मुताबिक संचालित करने के अलोकतांत्रिक कदमों से अमेरिका ने अपनी छवि धुंधली ही की है।
अब नाहक शुल्क लगाने की नीति से भारत के साथ उसके व्यापारिक रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है। सवाल है कि अमेरिका की लगातार मनमानी से दुनिया प्रगति के रास्ते पर बढ़ेगी या पीछे चली जाएगी और इसका खुद अमेरिका पर कैसा असर पड़ेगा?
