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संपादकीय: नाहक वंचित

हाल में अमेरिका ने एच-1 बी वीजा पर इस साल के अंत तक रोक लगा दी थी। अब वहां के आव्रजन प्राधिकार ने अमेरिका में पढ़ रहे विद्यार्थियों के संबंध में जो नई घोषणा की है, उसके असर से भारी तादाद में भारतीय विद्यार्थियों को भी अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है।

Author Published on: July 9, 2020 2:58 AM
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

दुनिया भर में कोरोना के संक्रमण को जितने खतरनाक रूप में देखा गया है, उसमें उससे बचाव के लिए किए गए उपायों से किसी को असहमति नहीं हो सकती। लेकिन इसकी वजह से उपजी अन्य स्थितियों को समस्या के संदर्भ में देखने और उसका हल निकालने के बजाय अगर किसी देश में इसे कुछ अनपेक्षित हित साधने का मौका बना लिया जाता है तो ऐसे फैसलों पर निश्चित रूप से सवाल उठेंगे।

हाल में अमेरिका ने एच-1 बी वीजा पर इस साल के अंत तक रोक लगा दी थी। अब वहां के आव्रजन प्राधिकार ने अमेरिका में पढ़ रहे विद्यार्थियों के संबंध में जो नई घोषणा की है, उसके असर से भारी तादाद में भारतीय विद्यार्थियों को भी अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है। दरअसल, अमेरिकी आव्रजन व सीमा शुल्क प्रवर्तन का कहना है कि जिन गैर-अप्रवासी एफ-1 और एम-1 विद्यार्थियों की पूरी कक्षाएं ऑनलाइन चल रही हैं, वे अमेरिका में नहीं रह सकते। ऑनलाइन पाठ्यक्रमों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों को या तो अमेरिका छोड़ देना चाहिए या फिर किसी दूसरे स्कूल में स्थानांतरण कराने जैसा कोई अन्य उपाय करना चाहिए। वहां अकादमिक शोध करने वाले विद्यार्थी एफ-1, जबकि वोकेशनल कोर्स करने वाले एम-1 के तहत अपनी पढ़ाई करते हैं।

अब अगर यह नियम अमल में आता है तो इसकी जद में दस लाख से ज्यादा विदेशी सहित करीब दो लाख भारतीय विद्यार्थी भी आएंगे। इनमें वैसे विद्यार्थियों को अमेरिका छोड़ना पड़ेगा, जिनके संस्थान ने मौजूदा संकट की परिस्थिति में ऑनलाइन कक्षाएं चलाने का फैसला किया है। अमेरिका में ताजा फैसले के पीछे धारणा शायद यह होगी कि जब कोई विद्यार्थी अपनी पढ़ाई ऑनलाइन माध्यम से करेगा तो वह अपने देश में रह कर भी ऐसा कर सकता है। लेकिन सच यह है कि भारत या किसी भी देश से अमेरिका जाने वाले विद्यार्थियों ने वहां जाने से पहले यह तय नहीं किया था कि उन्हें मौजूदा हालात का सामना करना पड़ेगा। अपने या अपने परिवार के पास से जरूरत भर धन खर्च कर वे वहां अमेरिकी शैक्षिक संस्थानों के परिसर और माहौल में अपनी पढ़ाई करने गए हैं।

अगर महामारी से बचाव के नाम पर फिलहाल नियमित कक्षाएं नहीं चल रही हैं तो इसमें उनका कोई कसूर नहीं है। फिर अगर कोई संस्थान फिलहाल ऑनलाइन कक्षाएं तो चला रहा है, लेकिन आने वाले दिनों में सब कुछ सहज होने पर वह फिर नियमित पढ़ाई कराने लगे तो इसे कैसे देखा जाएगा? क्या यह तात्कालिक संकट की स्थिति में फंसे विद्यार्थियों को अवसरों से जानबूझ कर वंचित करने जैसा नहीं है?

यही वजह है कि अमेरिका के प्रमुख शिक्षाविदों और सांसदों ने विदेशी विद्यार्थियों के लिए बनाए गए ताजा दिशा-निर्देश पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। इसे भयावह और क्रूर बताते हुए उन्होंने कहा है कि इस तरह अच्छा करने के बजाय नुकसान ज्यादा किया जा रहा है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि इस नियम के लागू होने के बाद अमेरिका छोड़ना जिन विद्यार्थियों की मजबूरी होगी, उन्हें किस संकट से दो-चार होना पड़ेगा।

दरअसल, एक के बाद एक अमेरिका ऐसे फैसले कर रहा है, जिसे वह अपने यहां कोरोना से बचाव और देश के फायदे में लिए गए निर्णय बता सकता है, लेकिन वहां गए लोगों और विद्यार्थियों को इनकी वजह से जो झेलना पड़ेगा, उसे किसी भी हाल में सही नहीं ठहराया जा सकता है। वैध तरीके से वहां रहने वाले लोगों के सामने अचानक ही देश से बाहर निकलने के हालात पैदा कर देना किस तरह केवल महामारी से बचाव की लड़ाई है?

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