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समझौते का संकट

परमाणु समझौते के मुद्दे पर ईरान और अमेरिका ने एक दूसरे पर कूटनीतिक दवाब बनाने का जो दांव शुरू किया है, उससे यही लग रहा है कि दोनों ही पक्ष आसानी से नहीं झुकने वाले।

Author Updated: February 24, 2021 9:03 AM
joe Bidenअमेरिकी राष्‍ट्र्र्र्र्रपति जो बाइडेन। फाइल फोटो

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पद संभालने के बाद से ही कुछ अंतरराष्ट्रीय विवादों को शांत करने को लेकर उदारता भरे संकेत दिए थे। तब उम्मीद बंधी थी कि अमेरिका के लिए संकट बने ईरान जैसे बड़े मुद्दे हल होने का रास्ता साफ होगा। बाइडेन ने कहा था कि वे ईरान पर लगाए प्रतिबंधों में ढील दे सकते हैं और उसके साथ परमाणु समझौते में फिर से लौट सकते हैं।

पर सवाल है कि इसके लिए पहल कहां से शुरू हो। ईरान का स्पष्ट रूप से कहना है कि अमेरिका पहले उस पर लगे प्रतिबंध हटाए और परमाणु समझौते में शामिल हो, तभी ईरान अपना यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम रोकेगा। अमेरिका चाह रहा है कि पहले ईरान परमाणु कार्यक्रम को बंद करे, तब आगे बढ़ा जाए। ऐसे में यह देखने वाली बात है कि कौन किसके और कितने दवाब में आता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि ईरान का रुख काफी सख्त है। इसीलिए उसने अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को अपने यहां परमाणु प्रतिष्ठानों का निरीक्षण करने से रोक दिया है। यह अप्रत्याशित नहीं था और इस रोक के लिए ईरान की संसद ने बाकायदा कानून बना दिया था, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि अगर तेईस फरवरी तक उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध वापस नहीं लिए गए तो वह अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) को अपने परमाणु प्रतिष्ठानों की जांच नहीं करने देगा।

ईरान का यह कदम बता रहा है कि वह टस से मस नहीं होने वाला। ईरान ने साफ कह दिया है कि वह आइएईए को परमाणु प्रतिष्ठानों के वीडियो तभी उपलब्ध कराएगा जब उस पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी जाएगी। आर्थिक प्रतिंबधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था को भारी धक्का लगा है और इस संकट से निकलने का एक ही रास्ता है कि पहले उस पर से आर्थिक प्रतिबंध हटें।

दूसरी ओर, ईरान को लेकर अमेरिका ने अभी तक किसी तरह की जल्दबाजी नहीं दिखाई है। वह इस वक्त स्थितियों का आकलन करने में लगा है। अमेरिका भी इस उलझन में है कि अगर वह आसानी से ईरान के समक्ष झुक गया और प्रतिबंध हटा लिए तो इससे ईरान का मनोबल बढ़ेगा। अमेरिका यही नहीं होने देना चाह रहा। बाइडेन ने 2015 के परमाणु समझौते पर लौटने की बात तो कही है, पर वे इसे कैसे और किन शर्तों के साथ अमल में लाएंगे, फिलहाल कोई नहीं जानता।

ईरान संकट को लेकर कतर ने भी काफी सक्रियता दिखाई है और उसके विदेश मंत्री लगातार ईरान के साथ संपर्क में हैं। कतर ईरान और अमेरिका दोनों का ही करीबी है। मध्य एशिया में अमेरिका की सैन्य कमान कतर में ही है। जबकि कतर और ईरान के गहरे कारोबारी रिश्ते हैं। कतर की कोशिश है कि किसी तरह से अमेरिका जल्दी से परमाणु समझौता में वापसी कर ले। कुछ और देशों ने भी मध्यस्थता के संकेत दिए हैं।

हालांकि अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत यूएसएस निमित्ज को फारस की खाड़ी से हटाने, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ अरबो डॉलर के हथियार सौदों पर फिलहाल रोक लगाने जैसे कदम उठा कर मध्यपूर्व में शांति की दिशा में बढ़ने के संकेत दिए हैं। पर मध्यपूर्व में शांति के लिए पहली जरूरी शर्त यही है कि सभी संबंधित पक्ष हठधर्मिता का रुख छोड़ें और दवाब की कूटनीति से बचें, बजाय इसके संतुलन बनाते हुए वार्ता की मेज पर आएं, तो समाधान असंभव नहीं है।

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