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राजनीति:अनियोजित शहरीकरण से बढ़ती मुश्किले

शहरीकरण सामाजिक स्तर और आर्थिक वृद्धि का सूचक जरूर माना जाने लगा है, लेकिन यह तभी ठीक है, जब शहर योजनाबद्ध तरीके से विकसित किए जाएं। विशेषज्ञों की समझ के मुताबिक सिर्फ आज के लिहाज से नहीं, बल्कि आगे के कई दशकों की जरूरत के हिसाब से सोचने की जरूरत पड़ती है। बहरहाल, देश इस समय अनियोजित शहरीकर शिकार नजर आ रहा है।

Developmentअनियोजित विकास हो सकता है घातक। फाइल फोटो।

सुविज्ञा जैन

शहरीकरण को आजकल किसी देश की आर्थिक और सामाजिक वृद्धि का सूचक माना जाता है। लेकिन अगर यह अनियंत्रित तरीके से होने लगे तो वह बड़ी समस्या बन जाता है। अपने देश में तो शहरीकरण ने अनेक समस्याएं खड़ी कर दी हैं। हालांकि हकीकत यह भी है कि तेज शहरीकरण के बावजूद आज भी देश की पैंसठ फीसद आबादी गांवों में बसती है।

यानी अगर शहरीकरण को विकास का पैमाना मान भी लिया जाए तो हम दुनिया के ज्यादातर देशों से अभी बहुत पीछे माने जाएंगे। बहरहाल, कितने भी पीछे हों, लेकिन जितना और जैसा शहरीकरण हो रहा है उसने गंभीर सोच-विचार के लिए हमें मजबूर कर दिया है। खासकर तब, जब शहरीकरण की मौजूदा चाहत के चलते अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक देश की शहरी आबादी गांवों की आबादी से ज्यादा हो जाएगी।

कुछ दशकों से देश में शहरों का फैलाव जिस तेजी से बढ़ा है, उसने कई नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इसे दो कोटियों में बांटा जा सकता है। पहला, शहरों का भौगौलिक रूप से फैलाव यानी गांवों और जंगलों का शहर के अंदर शामिल किया जाना और दूसरा, गांव के लोगों का शहरों में आकर बस जाना। अगर शहरों के भौगोलिक फैलाव की बात करें तो इससे पर्यावरण और खेती के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

जंगल घटते जा रहे हैं। इससे जलवायु परिवर्तन का असर और बढ़ रहा है। खेती की जमीन को आवासीय और उद्योग की श्रेणी में लाए जाने से किसान खुद भी अपनी जमीनें बेच रहे हैं। वे खेती छोड़ रहे हैं। इस समय बढ़ती भयावह बेरोजगारी के बीच एकमुश्त रकम पाने के लिए ग्रामीण भारत के एक बड़े वर्ग का इस तरह अपनी आजीविका का साधन खो देना आगे बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है।

कथित विकास की चाहत में अब पर्यावरण की चिंता कम की जाने लगी है। शहरी बसावटों के फैलने से नदियों के पाट सिकुड़ते जा रहे हैं। जल प्रबंधन की चुनौतियां बढ़ रही हैं। इस बात को भी कौन नकार सकता है कि अनियोजित और अवैध निर्माणों से ज्यादातर जलाशयों का पेटा खत्म हो चुका है। जहां तहां बाढ़ की समस्या खड़ी होने लगी है। इसी तरह जंगलों के घटने से वन्यजीव मुश्किल में हैं।

देश के महानगरों में प्रदूषण की चर्चा अब पूरी दुनिया में होने लगी है। हम भले आजकल प्रदूषण के अलग-अलग कारण बताते रहें, लेकिन हकीकत है कि उद्योगीकरण पर्यावरण को बुरी तरह बिगाड़ रहा है। हालांकि प्रौद्योगिकी ने प्रदूषणमुक्त विकास के नए-नए तरीके ईजाद किए हैं, लेकिन ये सारे तरीके इतने खर्चीले हैं कि अगर इन्हें अपनाएं तो औद्योगिक उत्पाद के दाम बढ़ जाते हैं।

जब हम विकास के सुखभोग का खर्चा उठाने के लिए बिलकुल तैयार न हों तो पर्यावरण के बचाव के उपायों को अपनाना बहुत दूर की बात हो जाती है। बहरहाल, देश के शहरी इलाकों में प्रदूषण की तीव्रता इस कदर बढ़ रही है कि आज भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित शीर्ष देशों में शामिल हो गया है। पिछले कुछ सालों से दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर भारत के ही गिनाए जाने लगे हैं। संबधित नियोजकों और विशेषज्ञों को अगर आगे कोई सोच-विचार करना हो तो यह भी याद दिलाया जा सकता है कि प्रदूषण अब सिर्फ वायु तक सीमित नहीं, जल और जमीन भी इसकी चपेट में हैं।

शहरों की आबादी बढ़ने से पैदा चुनौतियों के अन्य कारणों को भी समझना चाहिए। मसलन, आज गांव में रोजगार के मौके कम होने और खेती घाटे का व्यवसाय बन जाने से गांव की एक बड़ी आबादी शहरों की ओर पलायन कर चुकी है। ग्रामीण बेरोजगारी हद से ज्यादा बढ़ने से आने वाले समय में यह आंकड़ा और बढ़ने का अंदेशा है। शहरों में इतनी बड़ी आबादी की जरूरतें पूरी करने की क्षमता नहीं है। धीरे-धीरे देश के सभी मुख्य शहर जनसंख्या घनत्व के मामले में गंभीर स्थिति में आते जा रहे हैं। शहरों में रोजगार के मौके सीमित हैं। ऐसे में ज्यादा आबादी की वजह से हर किसी के पास अपनी जरूरत लायक कमाने का साधन नहीं है।

बढ़ती आबादी से शहरों में आवास भी एक बड़ी समस्या है। ज्यादातर लोग एक कमरे के घर में या झुग्गी झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं। स्लम यानी मलिन बस्तियों की समस्या अलग है। शहरों की झुग्गी झोपड़ियों में न पानी और बिजली की आपूर्ति हो पाती है और न ही बाकी सुविधाएं उन तक पहुंच पाती हैं। आबादी का घनत्व बढ़ने और साफ-सफाई के अभाव की वजह से इन बस्तियों के लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के शिकार अधिक बनते हैं।
देश के शहरों को अगर नगर नियोजन की कसौटी पर कसें तो कमोबेश हर शहर का घनत्व नियमों को तोड़ता दिखाई दे रहा है।

ज्यादा से ज्यादा आवास परियोजनाएं बनाने के चक्कर में घनत्व के नए-नए पैमाने बनाने पड़ रहे हैं। पार्क या खुली जगह के लिए कम से कम जगह छोड़ी जा रही है। अब ऐसा कोई शहर नहीं बचा है, जहां की परिवहन व्यवस्था जनसंख्या घनत्व का बोझ उठा पा रही हो। वाहनों की बढ़ती संख्या ने वायु प्रदूषण की समस्या को कई गुना बढ़ा दिया है। चौड़ी से चौड़ी सड़कों पर घंटों जाम लगने लगा है।

इसका मुख्य कारण शहरों में बढ़ता आबादी का घनत्व ही माना जाना चाहिए। गौर करें तो शहरी इलाकों के घनत्व के पैमानों की चर्चा ही नहीं होती। दरअसल, कम से कम जमीन पर ज्यादा से ज्यादा लोगों को बसाने का अर्थशास्त्र नगर नियोजकों पर दबाव बढ़ा रहा है कि वे नए-नए तर्क तलाशें और शहरों में ज्यादा से ज्यादा घनत्व को मान्यता देने का नया पैमाना बनाएं।

शहरों में बढ़ती आबादी कई और संकट पैदा कर रही है। इनमें पानी की कमी सबसे बड़ी समस्या है। आज देश का शायद ही कोई शहर बचा हो जो पानी की कमी से न जूझ रहा हो। खासकर महानगरों के खाते में उतना पानी उपलब्ध ही नहीं है, जितनी उनकी जरूरत है। सबसे बड़ी मिसाल खुद देश की राजधानी दिल्ली है। जल विज्ञानी हिसाब लगाएंगे तो दिल्ली के जलग्रहण क्षेत्र में बरसा कुल पानी कम है और उसकी सालाना खपत ज्यादा है। इसीलिए ज्यादातर शहर भूजल पर आश्रित हो गए हैं। एक चिंताजनक रिपोर्ट है कि कई शहरों में भूजल का स्तर इतना नीचे जा चुका है कि वहां जल संकट कभी भी एक हादसा बन सकता है।

शहरों से निकले कूड़े-कचरे का निस्तारण एक अलग चुनौती है। यह इतनी बड़ी समस्या बन गई है कि शहरों की गंदगी अब गांवों के सिर डाली जाने लगी है। कूड़ा प्रबंधन में दसियों शहर नाकाम होते जा रहे हैं। लैंडफिल नाम से जो व्यवस्थाएं थी वहां कूड़े के इतने ऊंचे पहाड़ बन गए कि उनके ढह कर बिखरने का खतरा खड़ा हो गया है। सभी तरह के कूड़े के पुनर्चक्रण की चर्चाएं बहुत होती हैं, लेकिन कहीं से भी बड़ी सफलता की खबर नहीं सुनाई देती। अगर गंभीरता से कोई अध्ययन किया जाए तो शहरीकरण से पैदा दसियों और चुनौतियां दिख सकती हैं।

कुल मिलाकर बात यह निकलती है कि शहरीकरण सामाजिक स्तर और आर्थिक वृद्धि का सूचक जरूर माना जाने लगा है, लेकिन यह तभी ठीक है, जब शहर योजनाबद्ध तरीके से विकसित किए जाएं। विशेषज्ञों की समझ के मुताबिक सिर्फ आज के लिहाज से नहीं, बल्कि आगे के कई दशकों की जरूरत के हिसाब से सोचने की जरूरत पड़ती है। बहरहाल, देश इस समय अनियोजित शहरीकरण का शिकार नजर आ रहा है।

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