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संपादकीयः मर्यादा के विरुद्ध

राजनीति में आलोचना-प्रत्यालोचना चलती रहती है। चुनाव के दिनों में इसमें और तेजी आ जाती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जिस तरह की बयानबाजी हो रही है वह चुनाव के दिनों में भी नहीं होनी चाहिए।

Author February 25, 2017 3:35 AM
एक चुनावी रैली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह। (Photo Source: PTI/File)

राजनीति में आलोचना-प्रत्यालोचना चलती रहती है। चुनाव के दिनों में इसमें और तेजी आ जाती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जिस तरह की बयानबाजी हो रही है वह चुनाव के दिनों में भी नहीं होनी चाहिए। मसलन, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने गोरखपुर में रैली को संबोधित करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक लोग ‘कसाब’ से छुटकारा न पा लें। इस ‘कसाब’ से उनका मतलब था- कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी। किसी भी पार्टी के नेता के लिए प्रतिद्वंद्वी पार्टियों से पिंड छुड़ाने का आह्वान करना स्वाभाविक है। लेकिन अन्य दलों को ‘कसाब’ कहने का क्या औचित्य है? कसाब नवंबर 2008 में मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में शामिल था और एकमात्र वही था जो जिंदा पकड़ लिया गया। अदालत से दोषी ठहराए जाने के बाद उसे फांसी दी गई। क्या अमित शाह की नजर में भाजपा को छोड़, अन्य पार्टियां प्रतिद्वंद्वी या राजनीतिक विरोधी न होकर देश की दुश्मन हैं? क्या भाजपा केवल खुद को राष्ट्रभक्त मानती है? क्या पता शाह इसी तरह की टिप्पणी किसी दिन द्रमुक या बीजू जनता दल के बारे में भी करें, जब वे चुनावी मुकाबले में सामने होंगे!

उत्तर प्रदेश का जनादेश कैसा होगा, कौन कह सकता है! पर यह साफ है कि भाजपा कड़ा मुकाबला झेल रही है, इसलिए वह कोई भी दांव छोड़ना नहीं चाहती। राजनीतिक विरोधियों को ‘कसाब’ के अंग्रेजी हिज्जे के जरिए रेखांकित करने के पीछे मंशा पाकिस्तान और मुसलिम-विरोध का कार्ड खेलने की भी रही होगी। लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा के एक नेता ने तो खुलेआम मोदी के विरोधियों को पाकिस्तान चले जाने की सलाह दे डाली थी। लगता है जिसे सबक सिखाना हो उसे पहले पाकिस्तान के पाले में धकेलना भाजपा की फितरत हो गई है। इससे असहमति और विरोध को कुचलने की उसकी अलोकतांत्रिक मानसिकता ही जाहिर होती है। भाजपा के लोग बात-बात में इमरजेंसी की याद दिलाते रहते हैं, पर राजनीतिक विरोधियों को ‘कसाब’ कहना क्या लोकतांत्रिक मिजाज का लक्षण है? लगता है, इस चुनाव में उक्ति चमत्कार पैदा करने की होड़ चल रही है। मोदी ने इसकी शुरुआत की, जब उन्होंने अंग्रेजी के ‘स्कैम’ शब्द की वर्तनी का इस्तेमाल उत्तर प्रदेश में आधार रखने वाले अन्य दलों को घेरने के लिए किया। फिर पलटवार में स्कैम का नया अर्थ आया, सेव कंट्री फ्रॉम अमित शाह एंड मोदी। बसपा का मोदी ने नया अर्थ निकाला, बहनजी संपत्ति पार्टी। फिर मायावती ने पलटवार में नरेंद्र दामोदरदास मोदी (एनडीएम) का मतलब बताया, निगेटिव दलित मैन। एक विज्ञापन का जिक्र कर अखिलेश ने ‘गुजरात के गधे’ जुमले का इस्तेमाल किया तो उसे भी शालीन नहीं कहा जा सकता।

इस तरह की टिप्पणियों को आपत्तिजनक या अनावश्यक और चुनाव प्रचार को छिछले स्तर पर ले जाने वाला ही कहा जा सकता है। पर इनमें देशभक्ति का एकाधिकार रखने का दंभ नहीं है जैसा कि ‘कसाब’ का शाह द्वारा निकाले गए मतलब में दिखता है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता देशभक्तों और देश के दुश्मनों के बीच नहीं होती, बल्कि इसमें फर्क विचारधारा तथा सरोकारों व प्राथमिकताओं का होता है। यही नहीं, इस बात के भी ढेरों उदाहरण हैं कि जो आज विरोधी हैं वे कल साथ खड़े थे। जो आज साथ हैं, कल वे दूसरी तरफ भी हो सकते हैं। इसलिए भी दूसरों की आलोचना करते समय मर्यादा का खयाल हर हाल में रखा जाना चाहिए।

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