Badaun Double Murder: उत्तर प्रदेश सरकार लगातार दावे करती रही है कि राज्य में कानून व्यवस्था नियंत्रण में है। मगर पिछले कुछ समय से लगातार अपराध, लूटपाट और हत्या के बढ़ते मामलों ने दावों की कलई खोल दी है। अपराधी बेशक बाद में पकड़ लिए जाते हों, लेकिन सच है कि वे वारदात को अंजाम देने से नहीं चूक रहे।

सवाल है उनके भीतर पुलिस का खौफ क्यों नहीं दिखता। पिछले दिनों संभल में कुछ लोग एक युवक को घर से खींच कर ले गए और उसकी बेरहमी से हत्या कर दी। इस घटना को लोग अभी भूले भी नहीं थे कि बदायूं में गुरुवार को हिंदुस्तान पेट्रोलियम के इथेनाल संयंत्र के दफ्तर में घुस कर दो वरिष्ठ अधिकारियों की गोली मार कर हत्या कर दी गई।

बताया जा रहा है कि काली सूची में डाले गए एक विक्रेता ने इस वारदात को अंजाम दिया। आरोपी पहले भी महाप्रबंधक स्तर के अधिकारी की कार पर हमला कर चुका था। जब इस मामले की पुलिस और जिला प्रशासन स्तर पर शिकायत दर्ज करा दी गई थी, तो आरोपी पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

सवाल यह भी है कि उच्च सुरक्षा वाले संयंत्र में हथियार लेकर वह कैसे घुसा? कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों के पास इसका क्या जवाब है? उत्तर प्रदेश में अपराधियों पर अंकुश नहीं लग पा रहा है, तो स्पष्ट है कि राज्य के पूरे पुलिस तंत्र में समन्वय का अभाव है। आए दिन हो रहीं हत्या की घटनाओं से समझा जा सकता है कि राज्य में अपराध पर लगाम लगने के दावे में दम नहीं है।

जमीनी सच्चाई यही है कि अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं। पुलिस की तमाम कथित सख्ती और सक्रियता के बावजूद आपराधिक मानसिकता के लोगों में कानून और सजा का कोई डर नहीं है। ऐसा लगता है कि अपराध नियंत्रण में कहीं न कहीं कमजोर कड़ी रह गई है, जिसकी शिनाख्त नहीं की जा रही है।

आज स्थिति यह है कि लोग खुद को घरों से लेकर दफ्तरों तक सुरक्षित नहीं पा रहे हैं। आए दिन जघन्य अपराधों के मद्देनजर उनकी चिंताएं नाहक नहीं हैं। सवाल है कि राज्य सरकार अपराध और अपराधियों पर काबू करने के जो दावे करती रही है, हकीकत उसके उलट क्यों दिख रही है।

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Retail Inflation: महंगाई की ‘डबल’ मार: युद्ध और रसोई का बढ़ता बजट (Photo: Gemini AI)

जब किसी भी तरह के रोजगार से आय का स्तर ठहरा हुआ हो, जरिया सीमित हो, तो आम आदमी की उम्मीद यही होती है कि बाजार में जरूरी वस्तुओं की कीमतें उसकी पहुंच में हों या फिर कम से कम स्थिर रहें। मगर पिछले कुछ वर्षों से आमदनी की तुलना में रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए लोगों को जितना खर्च करना पड़ रहा है, वह कई बार भारी पड़ता है। पढ़िए पूरा लेख…