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संपादकीयः उम्मीद का टीका

कोविडशील्ड अगर इन परीक्षणों में भी खरा उतरा तो भारतीय सीरम संस्थान इसका उत्पादन कराएगा। देश में दो और टीकों के परीक्षण पहले से चल रहे हैं जो भारत बायोटेक और कैडिला ने तैयार किए हैं।

यह तो साफ है कि जब तक कोरोना का टीका या दवा तैयार नहीं हो जाती, महामारी भयावह रूप में बनी रहेगी।

भारत में कोरोना टीके ‘कोविडशील्ड’ के परीक्षण में जुटे भारतीय सीरम संस्थान (एसआइआइ) को अब दूसरे और तीसरे चरण के मानव परीक्षण की इजाजत मिल जाने के बाद यह उम्मीद और बढ़ गई है कि इस वैश्विक महामारी से बचाव की दिशा में जल्द ही बड़ी कामयाबी हाथ लग सकती है। यह टीका ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने दवा कंपनी एस्ट्राजेनेका के साथ मिल कर तैयार किया है और ब्रिटेन, अमेरिका, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों में अब तक के सभी परीक्षणों में इसके काफी उत्साहजनक परिणाम मिले हैं। भारत में भी इस पर तेजी से काम चल रहा है। औषधि महानियंत्रक ने इसके मानव परीक्षण की मंजूरी दे दी है, जो दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान सहित देश के सत्रह चिकित्सा संस्थानों और अस्पतालों में होंगे। कोविडशील्ड अगर इन परीक्षणों में भी खरा उतरा तो भारतीय सीरम संस्थान इसका उत्पादन कराएगा। देश में दो और टीकों के परीक्षण पहले से चल रहे हैं जो भारत बायोटेक और कैडिला ने तैयार किए हैं। अब देखना यह है कि इनके कितने सुखद परिणाम आते हैं और हर स्तर के परीक्षणों में कामयाब रहने के बाद कब तक इनका व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो पाता है। हालांकि अब तक दुनिया में जितने टीकों का परीक्षण चल रहा है, उनमें कोविडशील्ड के ही सबसे ज्यादा कामयाब रहने की उम्मीदें हैं। इसलिए माना जा रहा है कि यह दुनिया के पहले कोरोना टीके के रूप में सामने आ जाए!

यह तो साफ है कि जब तक कोरोना का टीका या दवा तैयार नहीं हो जाती, महामारी भयावह रूप में बनी रहेगी। इसलिए हर देश, हर व्यक्ति इसी उम्मीद में है कि जल्दी ही टीका आए और इससे निजात मिले। पर जिस तरह से पूरी दुनिया में कोरोना का कहर जारी है, उससे तो यही लग रहा है कि टीके या दवा आ जाने के बाद भी खतरा आसानी से टलने वाला नहीं है। यह चिंता और आशंका फिजूल की इसलिए नहीं मानी जा सकती क्योंकि अब तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी स्पष्ट रूप से कह चुका है कि कोरोना की कारगर दवा कभी संभव नहीं है। जब दुनिया के तमाम देशों के वैज्ञानिक और चिकित्सक टीका विकसित करने में जुटे हैं, तो ऐसे में डब्ल्यूएचओ का आकलन संदेह पैदा करता है। ऐसा इसलिए है कि डब्ल्यूएचओ वैश्विक संस्था है और उसका काम ही बीमारियों और महामारियों से निपटने में सदस्य देशों की मदद करना है, उन्हें सही तथ्य और जानकारी देना है। यह मान कर चला जाता है कि महामारियों और इनके टीके व दवाओं के बारे में डब्ल्यूएचओ से ज्यादा सही सूचनाएं किसी के पास नहीं होंगी। इसलिए अगर खुद डब्ल्यूएचओ को यह लग रहा है कि कोरोना की अचूक दवा कभी नहीं बन पाएगी, तो यह चिकित्सा विज्ञान को बड़ी चुनौती है।

पर डब्ल्यूएचओ के ऐसे अनुमान से निराश हो कर तो बैठा नहीं जा सकता। दुनिया भर में करीब डेढ़ सौ तरह के टीकों पर काम चल रहा है। रूस जैसे देशों ने तो टीका बना लेने का दावा भी कर दिया है। अमेरिका और चीन जैसे देश भी सफलता के करीब होने की बात कह रहे हैं। अगर जल्दी ही टीका आ जाता है, जैसी कि उम्मीद भी है, तो इतना तो निश्चित है कि बड़ी संख्या में लोग महामारी की जद में आने से बच सकते हैं, भले टीके की मियाद साल या दो साल हो। पर कोई न कोई रास्ता तो निकलेगा। अभी जो हालात हैं, उनमें सिर्फ बचाव के उपाय ही हमें बचा सकते हैं।

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