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संपादकीय: राहत के बावजूद

पिछले कई दशकों से यह चिंता कायम रही है कि देश भर में मातृ मृत्यु-दर का जो स्तर बना हुआ है, उसके रहते हम विकास योजनाओं और नीतियों की कामयाबी का कितना दावा कर सकते हैं।

Mortalityदेश में मातृ-मृत्यु दर में गिरावट के आंकड़े राहत देने वाले हैं। फाइल फोटो।

हालांकि इस तस्वीर में सुधार के लिए समय-समय पर सरकारों की ओर से अलग-अलग कार्यक्रमों पर अमल किया जाता रहा, लेकिन अपेक्षित लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका। अब इस मसले पर कुछ रपटों में देश में मातृ-मृत्यु दर में गिरावट के आंकड़े राहत देने वाले हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने मंगलवार को परिवार नियोजन- 2020, प्रगति और बेहतर भविष्य विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम में इस उपलब्धि का उल्लेख किया कि भारत के महापंजीयक की ओर से कुछ समय पहले जारी रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल पूर्व जहां एक सौ बाईस थी, वह दो साल पहले घट कर एक सौ तेरह रह गई।

जाहिर है, उससे पूर्व भी इस मसले पर स्थिति अच्छी नहीं थी, मगर जमीनी स्तर पर योजनाओं का लाभ पहुंचने के बाद तस्वीर में सुधार की प्रक्रिया जारी है। मगर अब भी जो आंकड़े हैं, उसे संतोषजनक नहीं कहा जा सकता।

यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है कि गर्भावस्था, प्रसव के दौरान और बाद प्रति एक लाख में जितनी महिलाओं की मौत हो जाती है, उसके कारणों को दूर कर पाने में हम आजादी के इतने सालों के बाद भी कामयाब क्यों नहीं हो सके हैं! कायदे से देश में जो भी नीतियां और योजनाएं बनती हैं, उसका लक्ष्य अंतिम व्यक्ति तक पहुंच होनी चाहिए।

दस्तावेजों के मुताबिक तो सरकारों का हमेशा से दावा रहा है कि वह इस दिशा में ठोस कदम उठाती रही है और इसका असर भी देखने में आया है। पिछले कुछ दशकों के दौरान मातृ मृत्यु-दर में आई कमी इन कवायदों का नतीजा रही है, लेकिन सच यह है कि इस मामले में जितनी शिद्दत से काम किया जाना चाहिए था, उतना नहीं हुआ।

यह बेवजह नहीं है कि आजादी के इतने दशकों में विकास और अर्थव्यवस्था की मजबूती के तमाम दावों के बीच माताओं और नवजात शिशुओं के मरने की दर की कसौटी पर कुछ राहत के बावजूद कोई खुश होने वाली उपलब्धि हासिल नहीं की जा सकी है। मगर अब इस दिशा कुछ ठोस पहल होती दिख रही है।

दरअसल, किसी भी देश के विकास के पैमानों में यह पहलू सबसे अहम है कि वहां योजनाओं और नीतियों में माताओं और शिशुओं के स्वास्थ्य को लेकर क्या रुख अपनाया जाता है। अब भी देश में एक बड़ी आबादी ऐसी है, जिसमें महिलाओं को गर्भधारण के बाद उचित पोषणयुक्त आहार नहीं मिल पाता है। इसका असर न केवल उनकी तात्कालिक सेहत पर पड़ता है, बल्कि प्रसव के दौरान और बाद उनकी हालत अक्सर बेहद खराब हो जाती है।

आए दिन ऐसी खबरें देश की नीतियों पर सवालिया निशान लगाती हैं, जिनमें कोई महिला बच्चे को जन्म देते हुए या उसके बाद जिंदा नहीं बच पाती है। बाल मृत्यु-दर भी इससे अभिन्न हकीकत है। इसकी मुख्य वजह गरीब तबकों के परिवारों में गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के लिए पोषणयुक्त खानपान की कमी रही है।

फिर जागरूकता की कमी की वजह से परिवार नियोजन की जरूरत की अनदेखी की मार भी आमतौर पर महिलाओं को ही भुगतनी पड़ती है। समय के साथ अस्पतालों में प्रसव की सुविधा में विस्तार, पोषणयुक्त आहार के लिए लागू होने वाले सरकारी कार्यक्रम सहित अन्य पहलकदमियों की वजह से स्थिति सुधरी है। मगर जरूरत इस बात की है कि शिशु मृत्यु-दर के साथ-साथ मातृ मृत्यु-दर की समस्या को पूरी तरह खत्म करने के लिए ठोस पहलकदमी हो, क्योंकि देश के विकास की तस्वीर बिना इस समस्या से निपटे नहीं पूरी हो सकती।

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