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संपादकीय: चिंता के आंकड़े

महामारी को फैलने से रोकने के लिए पूर्णबंदी का जो कदम अपरिहार्य उठाया गया, उससे अधिकांश उद्योग-धंधे, कल-कारखाने बंद हो गए। लाखों छोटे उद्योग इस हालत में पहुंच गए कि दोबारा शुरू करने में उन्हें अब भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में बुनियादी क्षेत्र कैसे बचा रह सकता था! छोटे-मझौले उद्योगों और कारोबार और बुनियादी क्षेत्र के उद्योग एक दूसरे के पूरक हैं। बिना बिजली के क्या काम-धंधे चलने की कल्पना की जा सकती है? लेकिन जब देश के अधिकतर उद्योग बंद पड़े हों, तो बिजली की मांग में कमी तो आएगी ही।

महामारी के प्रकोप के बीच गिरती अर्थव्यवस्था चिंता का विषय है।

बुनियादी क्षेत्रों में गिरावट के जो ताजा आंकड़े आए हैं, वे अर्थव्यवस्था के गंभीर संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। बुनियादी क्षेत्र में गिरावट का दौर लंबे समय से बना हुआ है, लेकिन पिछले चार महीने में यह स्थिति कहीं ज्यादा बदतर हुई है। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि कोयला, सीमेंट, इस्पात, बिजली, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस और रिफाइनरी उत्पादन में भारी गिरावट आई है। सिर्फ उर्वरक उत्पादन में ही स्थिति संतोषजनक रही। बुनियादी क्षेत्र की यह तस्वीर देश के उद्योग जगत की दशा-दिशा बताने के लिए पर्याप्त है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले चार महीनों के दौरान कोरोना महामारी का अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा असर पड़ा है।

महामारी को फैलने से रोकने के लिए पूर्णबंदी का जो कदम अपरिहार्य उठाया गया, उससे अधिकांश उद्योग-धंधे, कल-कारखाने बंद हो गए। लाखों छोटे उद्योग इस हालत में पहुंच गए कि दोबारा शुरू करने में उन्हें अब भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में बुनियादी क्षेत्र कैसे बचा रह सकता था! छोटे-मझौले उद्योगों और कारोबार और बुनियादी क्षेत्र के उद्योग एक दूसरे के पूरक हैं। बिना बिजली के क्या काम-धंधे चलने की कल्पना की जा सकती है? लेकिन जब देश के अधिकतर उद्योग बंद पड़े हों, तो बिजली की मांग में कमी तो आएगी ही।

कुल मिला कर देखा जाए तो बुनियादी क्षेत्र के सभी आठ प्रमुख उद्योगों का उत्पादन जून मंत पंद्रह फीसद गिरा है। जबकि पिछले साल जून में इनमें वृद्धि तो थी, लेकिन बहुत ही मामूली। इसी तरह कोयला, सीमेंट और इस्पात के उत्पादन में भारी गिरावट रही। कोयले की सबसे ज्यादा मांग बिजली क्षेत्र से ही निकलती है और बिजली क्षेत्र घरेलू उपभोक्ताओं के अलावा देश के उद्योग जगत पर टिका है, जो पूर्णबंदी के कारण काफी हद तक चौपट हो गया। सबसे ज्यादा झटका इस्पात क्षेत्र को लगा है जिसके उत्पादन में तैंतीस फीसद से ज्यादा की कमी आई।

इस्पात की मांग कल-कारखानों, ढांचागत क्षेत्र की परियोजनाओं, भारी मशीनें और वाहन निर्माण व रीयल एस्टेट क्षेत्र में सबसे ज्यादा होती है। पर वाहन बनाने वाली कंपनियां पिछले दो साल से मंदी से जूझ रही हैं। रीयल एस्टेट क्षेत्र का एकदम भट्ठा बैठा हुआ है। कहीं कोई निर्माण गतिविधियां दिखाई नहीं देतीं। ऐसे में सीमेंट और इस्पात के उत्पादन पर तो मार पड़नी ही है। पूर्णबंदी की वजह से देशभर में सार्वजनिक और निजी परिवहन एक तरह से बंद ही रहा। इसके अलावा रेल और हवाई सेवाओं पर भी पूरी तरह से प्रतिबंध रहा। कहने को अब ये सेवाएं शुरू हुई हैं, लेकिन पूरी तरह से नहीं। इसका असर यह हुआ कि पेट्रोल और डीजल की खपत में अचानक से भारी कमी आई और तेलशोधक कारखानों का उत्पादन प्रभावित हुआ।

अब सरकार और उद्योगों की पहली चिंता यही है कि कैसे इस मंदी और गिरावट से उबरा जाए। कहने को सरकार अब तक बीस लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की योजनाओं और पैकेज का एलान कर चुकी है। पैकेजों का बड़ा हिस्सा उद्योगों में फिर से जान फूंकने के लिए है। लेकिन अभी बड़ी समस्या यह है कि बाजार में मांग नहीं है। ऐसे में कारोबारियों के सामने अब मुश्किल यह खड़ी हो रही है कि अगर वे उत्पादन करें और माल बिका नहीं, तो यह और बड़ा संकट होगा। सरकार के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती तो यह है कि लोगों और कारोबारियों के मन में बैठ गई अनिश्चितता और भय को दूर करे और क्रय शक्ति बढ़ाने के उपायों पर जोर दे। तभी बाजार में मांग और उत्पादन का चक्र फिर से शुरू पाएगा और उद्योग रफ्तार पकड़ सकेंगे।

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