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संपादकीयः बेलगाम अपराधी

इलाहाबाद में एक सेवानिवृत्त बुजुर्ग दारोगा की हत्या की घटना ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार की कार्यशैली और उसके दावों पर तीखा सवाल उठाया है।

Author September 5, 2018 1:00 AM
प्रतीकात्मक चित्र

इलाहाबाद में एक सेवानिवृत्त बुजुर्ग दारोगा की हत्या की घटना ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार की कार्यशैली और उसके दावों पर तीखा सवाल उठाया है। इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि एक ओर राज्य सरकार अपराधियों के खिलाफ जोर-शोर से अभियान चलाने और अपराध की घटनाओं की कमी का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर कोई अपराधी सरेआम किसी बुजुर्ग व्यक्ति की हत्या कर देता है और उसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं होता। गौरतलब है कि सोमवार को राज्य पुलिस सेवा से अवकाश प्राप्त अब्दुल समद खान साइकिल से कहीं जा रहे थे कि रास्ते में कुछ अपराधियों ने उन पर हमला किया और लाठी-डंडों से पीट-पीट कर उन्हें मार डाला।

हाल के वर्षों में समाज जैसा बना है, उसमें यह बात अब आश्चर्य पैदा नहीं करती है कि आसपास खड़े या वहां से गुजरते लोग इस घटना को होते चुपचाप देखते रहे, किसी ने उन्हें बचाने का साहस नहीं दिखाया। लेकिन ऐसा लगता है कि अपराधियों को इस बात का भी खौफ शायद बिल्कुल नहीं था कि वे पुलिस के हाथों पकड़े जा सकते हैं। सवाल है कि आखिर किन वजहों से अपराधियों को सरेआम इस वारदात को अंजाम देने में कोई हिचक नहीं हुई। दूसरे, जब वहीं लगे सीसीटीवी में समूची घटना रिकॉर्ड हो गई, आरोपी और सबूत सामने थे, इसके बावजूद पुलिस आरोपियों को तुरंत गिरफ्तार करने में नाकाम क्यों रही!

मीडिया में आई खबरों के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस घटना पर स्वत: संज्ञान लिया और उचित ही यह सवाल किया कि वारदात की सीसीटीवी फुटेज होने के बावजूद पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार क्यों नहीं कर सकी। अदालत ने पुलिस को इस मसले पर चौबीस घंटे में अपना जवाब पेश करने का आदेश दिया। खबरों के मुताबिक मृतक दारोगा अब्दुल समद का अपने पड़ोस के एक व्यक्ति जुनैद से जमीन को लेकर विवाद चल रहा था। जुनैद को पहले से ही उसकी अपराधी प्रवृत्ति के लिए जाना जाता है और उसने रिटायर्ड दारोगा को जान से मार डालने की धमकी दी थी। बेलगाम अपराध का यह कोई अकेला मामला नहीं है। यह बेवजह नहीं है कि पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति के लगातार बिगड़ने पर चिंता जताई जाने लगी है। हालत यह है कि खुद राज्यपाल ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर असंतोष जाहिर करते हुए कहा था कि इस सरकार में माफिया राज पर अंकुश भले लगा है, लेकिन अपराधों पर लगाम नहीं लगी है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान राज्य की कानून-व्यवस्था को भाजपा ने एक बड़ा मुद्दा बनाया था और सत्ता में आने पर तुरंत इस पर पूरी तरह लगाम लगाने का वादा किया था। लेकिन भाजपा की सरकार बनने से लेकर अब तक अपराधों की रोकथाम के मोर्चे पर कोई ऐसी उपलब्धि सामने नहीं दिख रही है, जिसे संतोषजनक कहा जा सके। राज्य सरकार इस मसले पर मुठभेड़ों में मारे गए अपराधियों के आंकड़े पेश करती है। हालांकि मुठभेड़ों को लेकर काफी विवाद की स्थिति बनी है, लेकिन यह समझना मुश्किल है कि इसके बावजूद हत्या या बलात्कार जैसे अपराधों के ग्राफ में इस कदर बढ़ोतरी क्यों हुई है। खासतौर पर महिलाओं के खिलाफ होने वाले बेलगाम अपराधों को देखते हुए राज्य की कानून-व्यवस्था पर सबसे ज्यादा सवाल उठाए जा रहे हैं। यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार अपराधियों से सख्ती से निपटने के दावे बढ़-चढ़ कर करती है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर अपराधों पर काबू पाने के लिए ठोस पहलकदमी नहीं हुई तो विकास की तमाम बातें बेमानी साबित होंगी।

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