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संपादकीय: अपराध के नुमाइंदे

उत्तर प्रदेश में बढ़ती आपराधिक घटनाओं को लेकर पहले ही सरकार सांसत में है। विपक्षी दल उस पर निशाना साध रहे हैं। हालांकि मुख्यमंत्री अपराध रोकने को लेकर सख्त दिखते हैं।

United Nations Uttar Pradesh policeहाथरस पीड़िता के परिवार के सदस्य। (पीटीआई)

घटना के तीन दिन बाद आखिरकार उत्तर प्रदेश पुलिस का विशेष कार्यबल बलिया गोली कांड के मुख्य आरोपी को गिरफ्तार करने में कामयाब हो गया। मगर इन तीन दिनों में वहां की पुलिस के कामकाज के तरीके और अपराधियों के राजनीतिक संरक्षण की कुछ और परतें उघड़ कर सामने आ गईं। गौरतलब है कि बलिया जिले के एक गांव में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की एक दुकान को लेकर चल रही बैठक में भरी पंचायत के सामने गोली मार कर गांव के एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई। उस वक्त जिले के पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारी भी मौजूद थे। खासा पुलिस बल तैनात था। मगर आरोपी को शायद इसका कोई खौफ नहीं था। वह हत्या कर निकल भागने में कामयाब रहा।

मृतक के भाई का तो यह भी आरोप है कि पुलिस ने आरोपी को पकड़ लिया था, मगर कुछ दूर ले जाकर छोड़ दिया। इसकी तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर प्रसारित की गईं। आरोपी को बचाने का प्रयास यहीं तक सीमित नहीं था। उस क्षेत्र के भाजपा विधायक भी आरोपी के पक्ष में उतर आए और सार्वजनिक तौर पर धमकी दी कि अगर दूसरे पक्ष के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई, तो वे थाने में धरने पर बैठ जाएंगे। विधायक के बेटे ने भी सोशल मीडिया पर लिख कर प्रदेश के मुख्यमंत्री को चुनौती दी।

उत्तर प्रदेश में बढ़ती आपराधिक घटनाओं को लेकर पहले ही सरकार सांसत में है। विपक्षी दल उस पर निशाना साध रहे हैं। हालांकि मुख्यमंत्री अपराध रोकने को लेकर सख्त दिखते हैं। ऐसे में अगर उनके दल का प्रतिनिधि खुद किसी अपराधी के पक्ष में उतर आए और सार्वजनिक तौर पर प्रशासन को चुनौती देने लगे, तो सरकार की स्थिति समझी जा सकती है। उचित ही विधायक के इस रवैए पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने संज्ञान लिया और उन्हें सख्त चेतावनी भेजी। इससे पार्टी के दूसरे नेताओं और कार्यकर्ताओं को कड़ा संदेश तो मिला ही है कि अपराधियों के पक्ष में खड़ा होना उनके लिए मुसीबत का सबब हो सकता है।

मगर उत्तर प्रदेश में अपराधियों पर लगाम लगाने की चुनौती फिर भी बनी हुई है। हाथरस मामले में बलत्कृत लड़की के शव को जिस तरह पुलिस ने रात के अंधेरे में जला दिया, उसे लेकर सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। उसके बाद भी बलात्कार की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रहीं। केंद्र ने बलात्कार के मामले में पुलिस की जवाबदेही तय करने के लिए कड़ा आदेश जारी किया है। उसके बावजूद उत्तर प्रदेश में पुलिस का रवैया बदला नहीं है।

अब तक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश में अपराधियों को प्रश्रय देने का आरोप पहले की सपा सरकार पर लगाते और अपराध के सफाए का दम भरते रहे हैं। मगर एक के बाद एक घटनाओं में जिस तरह पुलिस दोषियों के पक्ष में आंखें बंद किए या फिर पीड़ितों को प्रताड़ित करती दिखती है, उससे साफ हो गया है कि योगी सरकार के लोग भी अपराधियों को संरक्षण देने के मामले में पीछे नहीं हैं।

बलिया कांड में विधायक के खुलेआम अपराधी के पक्ष में उतर आने से इसका प्रत्यक्ष प्रमाण भी मिल गया। किसी घटना के तूल पकड़ने और जनमानस का दबाव बनने के बाद अपराधियों को गिरफ्तार कर लेने या कुछ अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त कर देने जैसी औपचारिक कार्रवाइयों से सरकार की इच्छाशक्ति का पता नहीं चलता। अगर वह सचमुच अपराध का खात्मा करने को लेकर गंभीर है, तो उसे दलगत स्वार्थों को त्यागना ही पड़ेगा।

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