ऐसा लगता है कि देश की राजधानी दिल्ली में अपराधियों को किसी का खौफ नहीं हैं। सुरक्षा के तमाम इंतजाम होने के दावों के बावजूद अगर आपराधिक घटनाएं दिनों-दिन बढ़ रही हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय है। यहां के नागरिकों के मन में अब भय और असुरक्षा की भावना पैदा होने लगी है।

शहर में सोमवार को अलग-अलग वारदात में एक स्कूली छात्र और कारोबारी समेत छह लोगों की हत्या कर दी गई। आए दिन इस तरह की घटनाओं ने यहां की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे पहले गत जनवरी के शुरुआती दो सप्ताह में दिल्ली में आठ सौ से अधिक लोगों के लापता होने की खबरें आईं थी।

यह निराशाजनक ही है कि ऐसे मामलों में सिवाय दिलासा देने के ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया, जिससे नागरिकों में सुरक्षा का भरोसा कायम हो। सवाल है कि आखिर राजधानी के पुलिस तंत्र में व्याप्त व्यवस्थागत खामियों को दूर करने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं?

इसमें दोराय नहीं कि सिर्फ कानून बना देने से व्यवस्था में सुधार नहीं हो सकता। कानून को प्रभावी तरीके से अमल में लाना जरूरी होता है और अति सुरक्षित कही जाने वाली देश की राजधानी दिल्ली में इसकी तस्वीर धुंधली ही नजर आती है। यही वजह है कि यहां अपराधियों को जैसे कानून का कोई खौफ नही है।

कब कौन लापता हो जाए या कब किसकी हत्या कर दी जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके में तो सोमवार को स्कूल के बाहर ही एक छात्र की चाकू से हमला कर हत्या कर दी गई और हमलावर आसानी से मौके से फरार हो गए।

ऐसे में यह सवाल भी महत्त्वपूर्ण है कि स्कूलों के आसपास नियमित पुलिस गश्त की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती है? पुलिस तंत्र किसी आपराधिक वारदात के बाद ही सक्रिय क्यों होता है! क्या अपराध होने से पहले ही उसे रोक देना पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है? ऐसे मामलों में संबंधित पुलिस कर्मियों और अधिकारियों की जवाबदेही तय की जानी जरूरी है, ताकि कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किया जा सके।