ताज़ा खबर
 

संपादकीयः आबादी की तस्वीर

संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया की जनसंख्या का मौजूदा हिसाब और भविष्य का एक मोटा अनुमान पेश किया है। इस तरह का अनुमान लगाना कोई आसान काम नहीं है।

Author Updated: June 24, 2017 3:27 AM
(AP)

संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया की जनसंख्या का मौजूदा हिसाब और भविष्य का एक मोटा अनुमान पेश किया है। इस तरह का अनुमान लगाना कोई आसान काम नहीं है। इसमें प्रजनन दर, मृत्यु दर, जीवन प्रत्याशा, रहन-सहन की सुविधाओं समेत अनेक कारकों का ध्यान रखना पड़ता है। संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या विभाग ने ऐसे सब कारकों पर गौर करते हुए दुनिया और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की आबादी के बारे में अनुमानित तस्वीर पेश की है। यह अध्ययन भारत के लिए बहुत मायने रखता है, क्योंकि विशाल आबादी के कारण तमाम चुनौतियों से उसे जितना जूझना पड़ेगा उतना किसी और देश को नहीं। इस रिपोर्ट के मुताबिक अभी दुनिया की आबादी 7.6 अरब है। 2005 से इसमें एक अरब का इजाफा हो चुका है, तथा 2030 तक इसमें एक अरब की और वृद्धि होने का अनुमान है। इस नक्शे में भारत को देखें। भारत की जनसंख्या अभी 1.34 अरब है। चीन की 1.41 अरब। पर अनुमान है कि भारत 2024 में चीन की बराबरी कर लेगा, तब दोनों की आबादी 1.44 अरब होगी। पर उसके बाद चीन पीछे छूट जाएगा और भारत नंबर एक पर आ जाएगा। अनुमान है कि 2030 तक भारत की जनसंख्या डेढ़ अरब के आसपास होगी। विशाल आबादी के भार को भारत अब भी हर क्षण महसूस करता है। सवाल है कि सर्वाधिक आबादी वाला देश होने जा रहे भारत की तैयारी क्या है? हर कोई जानता है कि इससे संसाधनों पर बोझ और बढ़ेगा। जल, जमीन और जीविका के लिए संघर्ष बढ़ेंगे। रिहाइश, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य सेवाओं की उपलब्धता की मांग और तेज होगी।

इस सब के मद््देनजर कोई व्यापक तैयारी देश में नहीं दिखती। बल्कि हमारे नीति नियंता कई बार यह जरूर कहते हैं कि जनसंख्या के लिहाज से हम अपेक्षया लाभ की स्थिति में हैं, क्योंकि हमारी आबादी में युवा अनुपात अधिक है। प्रधानमंत्री भी भारत को दुनिया का सबसे युवा देश कह कर कई बार इस तरफ ध्यान दिला चुके हैं। पर इसका लाभ हम तभी उठा सकते हैं जब सबको रोजगार मिले। बिना रोजगार के उत्पादक आय-वर्ग की उत्पादकता और कौशल का लाभ हम कैसे ले सकते हैं? इस समय हालत यह है कि इसे देश में रोजगार-विहीन विकास का दौर कहा जाने लगा है। दूसरी बात यह कि आबादी में युवा अनुपात अधिक होने का दौर हमेशा नहीं रहता। जीवन प्रत्याशा या औसत उम्र बढ़ने के साथ-साथ आबादी में बुजुर्गों व बूढ़ों का हिस्सा बढ़ता जाता है। इसलिए यह हैरत की बात नहीं कि 1951 में देश की आबादी में साठ साल से ज्यादा लोगों का अनुपात जहां साढ़े पांच फीसद था, वहीं 2011 में आकर वह करीब साढ़े आठ फीसद हो गया। 2001 से 2011 के बीच इसमें 35.5 फीसद की वृद्धि हुई। जाहिर है, भारत के सामने अपने वरिष्ठ नागरिकों की देखरेख की चुनौती और विकट होने वाली है।

हमारे देश में नब्बे फीसद से अधिक लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जहां कोई सामाजिक सुरक्षा योजना नहीं है। जब तक शरीर में दम है, आदमी खट लेता है, पर बुढ़ापे में हर किसी को सहारा चाहिए। असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की देखरेख के लिए क्या योजना है? सच तो यह है कि हमारे नीति निर्माताओं के लिए यह सवाल कोई खास मायने नहीं रखता, वरना सिर्फ दो-चार सौ रुपए के विधवा पेंशन और बुढ़ापा पेंशन के कार्यक्रम सरकारें न चला रही होतीं। एक तरफ बड़ी तादाद में युवाओं की बेरोजगारी है, यानी उनकी संभावित उत्पादकता का हम लाभ नहीं उठा पा रहे हैं, और दूसरी तरफ ज्यादातर वरिष्ठ नागरिकों के लिए कोई कारगर सामाजिक सुरक्षा योजना नहीं है। ऐसे में मौजूदा तथा आने वाली चुनौतियों का सामना कैसे होगा!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 संपादकीयः इसरो की उड़ान
2 संपादकीयः दलित बनाम दलित
3 संपादकीयः आतंक का सिलसिला
ये पढ़ा क्‍या!
X