भारत से हर साल बड़ी संख्या में लोग बेहतर रोजगार के लिए विदेश जाते हैं और वहां से विदेशी मुद्रा यहां भेजते हैं। इससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार को भी मजबूती मिलती है। मगर सवाल है कि विदेश में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? यूक्रेन के तट से रवाना हो रहे गिनी-बिसाऊ के ध्वज वाले एक वाणिज्यिक जहाज पर हाल ही में हुए हमले में चार भारतीय नागरिकों की मौत की घटना से यह सवाल एक बार फिर जोर पकड़ने लगा है।

इससे पहले होर्मुज जलमार्ग में तेल के एक जहाज पर हुए हमले में भारतीय नागरिक की मौत हो गई थी। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने यूक्रेन की घटना पर नई दिल्ली स्थित रूसी दूतावास के प्रभारी अधिकारी को तलब कर अपना विरोध दर्ज कराया है, लेकिन क्या इससे यह सुनिश्चित हो पाएगा कि भविष्य में ऐसी कोई घटना नहीं होगी। जाहिर है, भारत को ऐसे मामलों में कड़ा रुख अपनाना चाहिए और पीड़ित परिवारों को भी हरसंभव सहायता मुहैया कराने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

गौरतलब है कि बीती 19 जुलाई की शाम को एमवी गोल्डन लियो नामक वाणिज्यिक जहाज पर यूक्रेन के ओडेसा बंदरगाह से रवाना होते समय हमला हुआ था। उस वक्त जहाज पर चालक दल के सत्रह सदस्य सवार थे, जिनमें चार भारतीयों समेत दस लोगों की मौत हो गई, जबकि एक भारतीय नागरिक गंभीर रूप से घायल हो गया। यूक्रेन के विदेश मंत्रालय का दावा है कि यह हमला रूसी सेना की ओर से किया गया। रूस-यूक्रेन युद्ध में भारतीय नाविकों की मौत का यह पहला मामला है।

मगर सवाल है कि युद्ध के नियमों के विपरीत किसी असैन्य जहाज को निशाना क्यों बनाया गया? जबकि उस पर झंडा भी किसी तीसरे देश का लगा हुआ था। दूसरा, भारत सरकार को इस बात पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि अपने देश के नागरिकों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में युद्ध के प्रभाव वाले क्षेत्रों से कैसे दूर रखा जाए। साथ ही इस तरह के हमलों में पीड़ित परिवारों की मदद और मृतकों के शव शीघ्र स्वदेश लाने की प्रक्रिया को भी आसान बनाया जाना चाहिए।