इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि आज के आधुनिक परिवेश में भी समाज में जातिगत भेदभाव की धारणा बनी हुई है। यहां तक कि उच्च शिक्षण संस्थानों में भी जाति के आधार पर भेदभाव के मामले अक्सर सामने आते रहते हैं। इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने नए नियम जारी किए हैं। मगर इनको लेकर अब विरोध भी शुरू हो गया है। विशेषकर उत्तर प्रदेश में तो कुछ अधिकारी भी इन नियमों के खिलाफ खड़े हो गए हैं। यही नहीं, अब इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में भी याचिका दायर की गई है।

सवाल है कि आखिर यूजीसी के इन नियमों का विरोध क्यों हो रहा है? दरअसल, कुछ लोगों को आशंका है कि आयोग के नए नियमों का दुरुपयोग किया जा सकता है, जिससे सामान्य वर्ग के शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए नई मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। हालांकि, केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने भरोसा दिलाया है कि न तो किसी के साथ भेदभाव होने दिया जाएगा और न ही नियमों के बेजा इस्तेमाल की अनुमति दी जाएगी।

UGC Regulations 2026 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, नए नियमों पर लगा रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन आरोप

गौरतलब है कि यूजीसी ने नियमों का जो नया प्रारूप जारी किया है, उसे लेकर कई तरह की आशंकाएं पैदा हो गई हैं। दावा किया जा रहा है कि नए नियमों में जातिगत भेदभाव की झूठी शिकायतों के मामले में सजा का कोई प्रावधान नहीं है और नियमों का पालन न करने पर संस्थान पर कार्रवाई की जा सकती है।

इन नियमों के विरोध में उत्तर प्रदेश के बरेली के एक नगर मजिस्ट्रेट और अयोध्या में एक जीएसटी अधिकारी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। एक सवाल यह भी उठ रहा है कि जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की निष्पक्ष जांच कैसे होगी, यह नए नियमों में पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

इसमें दोराय नहीं कि यूजीसी के नियमों को लेकर जो आशंकाएं पैदा हुई हैं, उनका निश्चित रूप से निराकरण होना चाहिए, लेकिन विरोध के नाम पर जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है, उससे सामाजिक सौहार्द बिगड़ने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस मसले पर संयम और संवेदनशीलता दिखाने की जरूरत है।