ताज़ा खबर
 

सजा का सबक

राजधानी दिल्ली में पिछले साल पांच दिसंबर की रात टैक्सी में एक युवती से बलात्कार के दोषी को आजीवन कारावास की सजा ऐसे अपराधियों के लिए निश्चित रूप से एक सबक है...

Author नई दिल्ली | November 4, 2015 9:37 PM
जज ने दोषी कैब चालक यादव को भादंसं की धारा 376 (2) (एम) के तहत अपराध के लिए आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाई। (पीटीआई फोटो)

राजधानी दिल्ली में पिछले साल पांच दिसंबर की रात टैक्सी में एक युवती से बलात्कार के दोषी को आजीवन कारावास की सजा ऐसे अपराधियों के लिए निश्चित रूप से एक सबक है। लेकिन यह अपने आप में त्रासद तथ्य है कि रात में सुरक्षित घर पहुंचने के लिए युवती ने बेखौफ सफर का भरोसा देने वाली कंपनी उबर की टैक्सी को किराए पर लिया और उसी में उसे अपराध का शिकार होना पड़ा था। चलती बस में एक युवती के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और फिर उसकी हत्या के बाद राजधानी में महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर सरकार और पुलिस की लापरवाही को लेकर तीखे सवाल उठे थे और एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया था।

फिर न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की अध्यक्षता में गठित आयोग ने महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मसले पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट और सिफारिशें सरकार को सौंपी थी। लेकिन जमीनी स्तर पर सुरक्षा के उपायों पर कितना ध्यान दिया गया इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध के दूसरे तमाम मामले सामने आते रहे। पिछले साल उबर कंपनी की टैक्सी में हुए अपराध ने भी चूंकि काफी तूल पकड़ लिया था, शायद इसीलिए पुलिस ने काफी शिद्दत से इस घटना की जांच की और सबूत जुटाए। नतीजतन, साल भर के भीतर इस मामले पर अदालत का फैसला आ गया कि ‘अभियुक्त को अंतिम सांस तक सलाखों के पीछे रहना होगा’।

इस मामले में दूसरा पहलू यह भी सामने आया कि एक आपराधिक मानसिकता का व्यक्ति कैसे अपने समूचे परिवार के लिए भी बोझ और त्रासद साबित होता है। इस मामले में अपराधी के माता-पिता, उसकी पत्नी और तीन बच्चे उसी पर निर्भर थे। लेकिन अपराध में शामिल न होने के बावजूद अब उन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसके मद्देनजर अदालत ने दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़ित के साथ-साथ दोषी के परिवार को भी आर्थिक मदद मुहैया कराने का आदेश दिया है।

दिल्ली में निजी कंपनियों की टैक्सी में सुरक्षा पर सवाल उठते रहे हैं। खासकर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के मद्देनजर टैक्सियों में जीपीएस लगाने से लेकर तमाम दूसरे व्यावहारिक इंतजाम के सुझाव भी सामने आए। लेकिन सरकार और पुलिस ने अपने टालमटोल भरे रवैये के चलते इन्हें सुनिश्चित करने या टैक्सी कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम उठाना जरूरी नहीं समझा। यही वजह है कि आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती हैं और पीड़ितों के लिए इंसाफ की एकमात्र आस अदालतें होती हैं।

सवाल है कि एक नागरिक की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना अगर राज्य का दायित्व है, तो किसी व्यक्ति को अपने साथ हुई त्रासदी को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाने की नौबत क्यों आनी चाहिए? उबर जैसी जो निजी टैक्सी कंपनियां यात्री को महफूज अपने घर पहुंचाने का भरोसा देती या दावा करती हैं, उन पर व्यवहार में भी अमल तय करना किसकी जिम्मेदारी है? आखिर किन वजहों से उबर ने एक ऐसे व्यक्ति को चालक की नौकरी देने की लापरवाही बरती, जो पहले भी कई अपराधों में लिप्त रह चुका था? इस घटना ने उबर जैसी कंपनियों और उनकी व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा किया है। सरकार को ऐसे उपाय करने की जरूरत है जिनसे टैक्सी कंपनियों की मनमानी और टैक्सियों में असुरक्षा पर नकेल कसी जा सके।

लगातार ब्रेकिंग न्‍यूज, अपडेट्स, एनालिसिस, ब्‍लॉग पढ़ने के लिए आप हमारा फेसबुक पेज लाइक करेंगूगल प्लस पर हमसे जुड़ें  और ट्विटर पर भी हमें फॉलो करें

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App