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संपादकीयः मौत का कारोबार

पंजाब के तीन जिलों में जहरीली शराब पीकर करीब दो दर्जन लोगों की मौत से फिर यही साबित हुआ है कि सरकार अपने स्तर पर भले चौकसी बरतने के दावे करे, लेकिन उन पर अमल की हकीकत कुछ और होती है।

Author Published on: August 1, 2020 12:37 AM
अव्वल तो शराब के वैध-अवैध निर्माण से लेकर उसकी बिक्री को लेकर तमाम तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं।

किसी त्रासद घटना का सबक यह होना चाहिए कि उससे बचाव या उसे रोकने के हर संभव उपाय किए जाएं। लेकिन विडंबना यह है कि वैसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार में बाकायदा एक महकमा तैनात होने और कोई गड़बड़ी नहीं होने देने के दावे के बावजूद अक्सर बरती जाने वाली लापरवाही की वजह से लोगों की जान चली जाती है। पंजाब के तीन जिलों में जहरीली शराब पीकर करीब दो दर्जन लोगों की मौत से फिर यही साबित हुआ है कि सरकार अपने स्तर पर भले चौकसी बरतने के दावे करे, लेकिन उन पर अमल की हकीकत कुछ और होती है। खबर के मुताबिक अमृतसर, गुरदासपुर और तरण तारण जिलों में कई जगहों पर जो शराब बेची गई, उन्हें पीने के बाद कम से कम चौबीस लोगों की मौत हो गई। मौत के पहले पांच मामले तीन दिन पहले अमृतसर के तारसिक्का के तांगड़ा और मुच्छल गांव से सामने आए थे। लेकिन समय रहते प्रशासन की ओर से जरूरी सक्रियता नहीं बरती गई। नतीजतन, मरने वालों की संख्या बढ़ती गई। अब राज्य के मुख्यमंत्री ने इस समूचे मामले में जालंधर के संभागीय आयुक्त द्वारा मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए हैं।

सवाल है कि इस तरह की सक्रियता सरकार और संबंधित महकमे अपनी नियमित ड्यूटी में क्यों नहीं दिखाते! सरकार और प्रशासन की नींद तभी क्यों खुलती है जब उनकी लापरवाही की वजह से काफी लोगों की जान चली जाती है? शराब की बिक्री एक ऐसा कारोबार है, जिस पर आमतौर पर प्रशासन की निगरानी होने का दावा किया जाता है। शराब की दुकानों के खुलने या बंद होने तक को लेकर आधिकारिक घोषणाएं होती हैं। तो आखिर यह कैसे संभव हो जाता है कि इस बीच किसी शराब बनाने वाले को जहर मिला शराब बेचने का मौका मिल जाता है। अगर शराब में जहर मिलाने का कारोबार सुनियोजित तरीके से नहीं होता है तो इसे बनाए जाने के क्रम में इस पर निगरानी और जांच के लिए क्या व्यवस्था की गई है? वैध या अवैध तरीके से बनाई गई शराब की खरीद-बिक्री पर रोक के लिए जो घोषित व्यवस्थाएं हैं, उसे लागू करने वाले महमके हैं, उनकी क्या जिम्मेदारी है? शराब का खरीदार आखिर कैसे पहचान करेगा कि वह जो खरीद रहा है, उसमें उसकी मौत का सामान मिला हुआ है या नहीं!

अव्वल तो शराब के वैध-अवैध निर्माण से लेकर उसकी बिक्री को लेकर तमाम तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं। कई राज्यों में लोगों की सेहत और दूसरे सामाजिक प्रभावों के मद्देनजर शराब की खरीद-बिक्री पर पूरी तरह कानूनी प्रतिबंध लगाया गया है। यह अलग समस्या है और सरकार या प्रशासन की नाकामी है कि प्रतिबंध के बावजूद कालाबाजारी के रास्ते शराब की बिक्री चलती रहती है। लेकिन जहां कानूनी दायरे में इसका कारोबार चलता है, वहां भी इस मसले पर घोर लापरवाही क्यों बरती जाती है? यह किसी से छिपा नहीं है कि अवैध तरीके से बनाई गई मिलावटी, सस्ती या फिर कच्ची शराब का सेवन आमतौर पर गरीब तबके के लोग करते हैं। इस वजह से देश भर में हर साल सैकड़ों लोगों की जान चली जाती है। मगर शायद ही सरकारों की ओर से कोई ऐसा कदम उठाया जाता है, जिससे मौत के ऐसे कारोबार को रोका जा सके। जब लोगों के मरने की कोई बड़ी घटना सामने आ जाती है तब जाकर आनन-फानन में कुछ अधिकारियों के निलंबन और जांच की कार्रवाइयों की औपचारिकता निभाई जाती है और कुछ समय बाद फिर सब कुछ पहले की तरह चलने लगता है। सरकार और प्रशासन की इस प्रवृत्ति के रहते शराब के जानलेवा कारोबार पर लगाम की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

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