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संपादकीयः सुविधा की पाबंदी

यह एक विचित्र स्थिति है कि जिस आदेश को अमेरिकी युवाओं को रोजगार मुहैया कराने में सबसे बड़े सहायक कारक के रूप में देखा जा रहा है, उसका कोई बड़ा फर्क मौजूदा हालात में नहीं आने वाला है।

2016 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप ने एच-1 बी वीजा को अमेरिकी हितों के खिलाफ बताया था।

करीब डेढ़ महीने पहले जब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी लोगों की रोजगार की सुरक्षा के नाम पर एच-1 बी वीजा धारकों से संबंधित आदेश जारी किया था, तभी यह साफ था कि चुनावी साल में दूसरे देशों के कामगार मुद्दों की भेंट चढ़ने वाले हैं। उस समय भी ट्रंप ने अमेरिकियों के हित सुनिश्चित करने का हवाला देकर यह सख्त आदेश लागू करने की ओर कदम बढ़ाए थे और अब उस पर हस्ताक्षर करते हुए भी उन्होंने यही दलील दोहराई है। हालांकि पहले भी प्रवासी भारतीयों से लेकर दूसरे तमाम क्षेत्रों से इस फैसले को वापस लेने की आवाजें उठी थीं। वैश्विक संकट के इस दौर में यह उम्मीद की जा रही थी कि ट्रंप इस पर विचार करेंगे। लेकिन आखिरकार उन्होंने एच-1 बी वीजा धारकों को अमेरिका में रोजगार के अवसर से वंचित करने वाले आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए। जाहिर है, जो युवा इस आशंका से जूझ रहे थे कि अब न केवल उनका वहां रहना मुश्किल हो जाएगा, बल्कि अच्छी नौकरी के जिस सपने के साथ वे वहां जाने वाले थे या गए थे, वह एक तरह से छीन लिया जाएगा।

यह एक विचित्र स्थिति है कि जिस आदेश को अमेरिकी युवाओं को रोजगार मुहैया कराने में सबसे बड़े सहायक कारक के रूप में देखा जा रहा है, उसका कोई बड़ा फर्क मौजूदा हालात में नहीं आने वाला है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक अमेरिका में एच-1 बी वीजा धारकों में से सबसे ज्यादा युवा कंप्यूटर से जुड़ी नौकरी करते हैं। लेकिन ऐसी नौकरियों में अभी भी वहां बेरोजगारी की दर काफी कम है। जबकि अन्य नौकरियों में फिलहाल बेरोजगारी दर करीब चार फीसदी से बढ़ कर साढ़े तेरह फीसदी हो गई है। साफ है कि एच-1 बी वीजा से संबंधित नए आदेश पर अमल के बावजूद अमेरिकियों को कोई बड़ा फायदा नहीं होने जा रहा है, लेकिन इस वीजा के तहत वहां काम करने वाले लोगों का भविष्य जरूर अनिश्चित हो जाएगा। एच-1 बी वीजा अमेरिकी कंपनियों को विदेशी कामगारों को नियुक्त करने की अनुमति देता है। वहां की कंपनियां विदेशी युवाओं को इसलिए भी मौका देती हैं कि उनके वेतन या दूसरे मदों में उन्हें अमेरिकी नागरिकों के मुकाबले काफी कम खर्च करना पड़ता है। यानी यह व्यवस्था एक तरह से अमेरिकी कंपनियों के आर्थिक हित से जुड़ी है।

दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप इस नए नियम को लेकर अभी ज्यादा संवेदनशील नजर आ रहे हैं तो शायद इसलिए कि 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने एच-1 बी वीजा को अमेरिकी हितों के खिलाफ बताया था और इसे चुनावी मुद्दा बनाया था। अब एक बार फिर उन्हें इस मुद्दे को हवा देने का मौका इसलिए मिल गया है कि वैश्विक महामारी और पूर्णबंदी के दौर में रोजगार का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है और वे इस बहाने अमेरिकी लोगों के हित की लड़ाई लड़ने का दावा कर सकते हैं। इसलिए इस मुद्दे को हवा देना उनकी चुनावी राजनीति की जरूरत भी है। लेकिन सवाल है कि अमेरिका में रोजागार क्षेत्र में बहुत कम फर्क डालने वाले इस मसले पर उन्हें इतना सख्त रवैया अपनाना जरूरी क्यों लगा, जबकि वहां के चुनावी नतीजे पर प्रवासी भारतीयों के रुख का भी खासा असर पड़ता है! हालांकि यह कहना मुश्किल है कि इस फैसले से अमेरिका में ट्रंप सरकार की नीतियों से उपजे असंतोष की भरपाई करने में कितनी मदद मिलेगी! लेकिन यह जरूर होगा कि अमेरिका में अच्छे भविष्य का सपना पालने वाले भारतीय और दूसरे देशों के युवाओं के सामने चुनौतियां गहरा जाएंगी।

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