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लूट का सफर

रेलगाड़ियों में चोरी, झपटमारी, जहरखुरानी, लूटपाट, महिलाओं के साथ बदसलूकी और हिंसा आदि की घटनाओं पर अंकुश लगाने के मकसद से कई बार कुछ उपाय किए गए, पर उनका अपेक्षित नतीजा नहीं आ पाया है। लंबी दूरी की गाड़ियों के हर डिब्बे में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती के प्रावधान किए गए।

Author September 5, 2015 9:07 AM

रेलगाड़ियों में चोरी, झपटमारी, जहरखुरानी, लूटपाट, महिलाओं के साथ बदसलूकी और हिंसा आदि की घटनाओं पर अंकुश लगाने के मकसद से कई बार कुछ उपाय किए गए, पर उनका अपेक्षित नतीजा नहीं आ पाया है। लंबी दूरी की गाड़ियों के हर डिब्बे में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती के प्रावधान किए गए।

रेलवे रिजर्व पुलिस बल को मुस्तैद बनाने के अलावा यह भी नियम बनाया गया कि जिन-जिन राज्यों से गाड़ियां गुजरेंगी, वहां की पुलिस भी उनमें सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मा संभालेगी। मगर अक्सर मुसाफिरों के साथ लूटपाट, बदसलूकी, मारपीट आदि की शिकायतें मिलती रहती हैं। समता एक्सप्रेस में ग्वालियर से दिल्ली आ रही एक प्रधानाध्यापिका को बेहोश कर लूटपाट इसका ताजा उदाहरण है।

गौरतलब है कि प्रधानाध्यापिका शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति पुरस्कार लेने दिल्ली आ रही थीं। घटना उत्तर प्रदेश के मथुरा के आसपास की है। पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश से होकर गुजरने वाली गाड़ियों में झपटमारी और महिलाओं के साथ बदसलूकी की घटनाएं बढ़ी हैं।

कुछ मामलों में बदमाशों ने मुसाफिरों को लूटपाट के बाद चलती गाड़ी से बाहर फेंक दिया। पर हैरानी की बात है कि न तो रेलवे सुरक्षा बल ऐसी घटनाओं पर काबू पाने में कामयाब हो पा रहा है और न पुलिस एहतियाती उपायों पर ध्यान दे रही है।

रेल मंत्रालय हर बजट में रेल-यात्रा को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाने का वादा करता है। चलती गाड़ियों में आपराधिक घटनाओं पर नकेल कसने के कड़े उपाय करने का भरोसा भी दिलाया जाता है। पर स्थिति जस की तस बनी रहती है। खुद सुरक्षाकर्मियों पर आरोप लगते रहे हैं कि वे दिल्ली, मुंबई या दूसरे औद्योगिक शहरों से उत्तर प्रदेश और बिहार के अपने गांवों को लौटने वाले मजदूरों आदि को डरा-धमका कर पैसे वसूलते हैं।

जब भी कोई बड़ी घटना होती है, सुरक्षाकर्मियों की कमी की दलील देकर रेलवे अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश करता है, पर हकीकत यह है कि उनकी तादाद इतनी भी कम नहीं है कि ट्रेनों में सुरक्षा पर ध्यान न दिया जा सके। कई बार अपराध की सूचना मिलने पर भी सुरक्षाकर्मी मौके पर नहीं पहुंचते। असल में बड़ा मसला उनको जवाबदेह बनाने का है।

दिल्ली जा रही प्रधानाध्यापिका को बेहोश कर लूटे जाने की घटना शायद इसलिए प्रमुखता से खबर बन सकी कि उनकी यात्रा राष्ट्रपति पुरस्कार से जुÞड़ी थी। वरना ऐसी न जाने कितनी घटनाएं होती हैं और या तो वे दब-दबा दी जाती हैं या उनका संज्ञान नहीं लिया जाता। भीड़ भरी गाड़ियों में सफर कर रहे अनेक प्रवासी मजदूरों को आए दिन बदमाशों और खुद सुरक्षाकर्मियों की मनमानियां सहनी पड़ती हैं, मगर उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता।

यों सरकार रेलवे को विश्व मानकों के अनुरूप बनाने का दम भरती है, गाड़ियों में आसानी से टिकट, साफ-सुथरा भोजन, आरामदेह बिस्तर आदि उपलब्ध कराने की योजनाओं पर लगातार काम करती देखी जाती है। पर मुसाफिरों की सुरक्षा का तकाजा सबसे बड़ा है। सुरक्षित सफर के भरोसे के बगैर रेलवे को बेहतर बनाने के तमाम दावे खोखले ही साबित होंगे।

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