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संपादकीयः संकट की आहट

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया जहां रसातल में जा रहा है, वहीं पेट्रोल और डीजल के दाम सारे रेकार्ड तोड़ रहे हैं।

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया जहां रसातल में जा रहा है, वहीं पेट्रोल और डीजल के दाम सारे रेकार्ड तोड़ रहे हैं। अर्थतंत्र से जुड़ी ये दोनों ही घटनाएं बता रही हैं कि हालात चिंताजनक हैं और एक तरह से बेकाबू होते लग रहे हैं। रुपए की गिरती कीमत सरकार के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए। पिछले एक पखवाड़े में रुपया पचासी पैसे तक गिर गया है, लेकिन सुनने को सिर्फ यही मिल रहा है कि यह गिरावट अस्थायी है और लंबे समय तक नहीं रहने वाली। सरकार एक तरफ यह दावा कर रही है कि अर्थव्यवस्था के संकेतक मजबूत हैं, दूसरी ओर रुपए की गिरती सेहत हकीकत बयान करने के लिए काफी है। पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने के कारणों की बात आती है तो यही सुनने को मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम बढ़ रहे हैं और रुपया गिर रहा है, इसलिए कच्चा तेल महंगा पड़ रहा है। इसका मतलब तो यह हुआ कि सब कुछ बाहरी कारणों से हो रहा है और हम इसके लिए कुछ नहीं कर सकते और हमें यह भुगतना ही होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि अब तक ऐसे ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए जिनसे हालात काबू में आते, रुपए ठहरता और पेट्रोल-डीजल के दाम भी आसमान नहीं छूते। सिर्फ यही दलील देकर बचाव करते रहना कि इन संकटों के कारण कहीं और हैं, सरकार की लाचारगी को दिखाता है।

कहा जा रहा है कि डॉलर की कीमत के रूप में रुपया अभी बहत्तर तक जाएगा। ऐसे में पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी अभी काफी बढ़ें तो आश्चर्य नहीं होगा। पिछले एक महीने में पेट्रोल ढाई रुपए और डीजल तीन रुपए से भी ज्यादा महंगा हो जा चुका है। सरकार तर्क दे रही है कि पिछले एक पखवाड़े में कच्चा तेल सात फीसद तक महंगा हो चुका है। वेनेजुएला और ईरान ने तेल उत्पादन घटा दिया है। अमेरिका ने भारत सहित कई देशों को पहले ही चेतावनी दे दी है कि वे चार नवंबर के बाद ईरान से तेल लेना बंद कर दें। भारत ईरान से सस्ते में और भारी मात्रा में तेल खरीदता है। अगर हालात गंभीरता के संकेत दे रहे हैं तो हम उससे निपटने के लिए कर क्या रहे हैं, यह गंभीर सवाल है। ऐसे में क्या हम हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहें और बाहरी कारणों का रोना रोते रहें?

ऐसा नहीं है कि सरकार के पास पेट्रोल और डीजल सस्ता करने का कोई तात्कालिक उपाय नहीं है। केंद्र पेट्रोल पर 19.48 रुपए और डीजल पर 15.33 रुपए उत्पाद शुल्क वसूल रहा है। इसके अलावा राज्य सरकारें इस पर भारी वैट लगाती हैं। ये दोनों कर ऐसे हैं जिनसे सरकारें अपना खजाना भर रही हैं। इसलिए व्यावहारिक कदम यह होना चाहिए कि अगर पेट्रोल और डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं तो फौरी राहत के लिए केंद्र तत्काल कदम उठाते हुए उत्पाद शुल्क में कटौती करे और राज्य भी वैट कम करें। पेट्रोल और डीजल महंगा होने की सीधी और सबसे ज्यादा मार आम आदमी पर पड़ रही है। ढुलाई महंगी होने से खाने-पीने की चीजें और रोजमर्रा के इस्तेमाल के सामान सहित सार्वजनिक परिवहन भी महंगा होता है। दो पहिया वाहन इस्तेमाल करने वालों की तादाद करोड़ों में है। महंगे डीजल और डॉलर की मार छोटे और मझोले उद्योगों पर भी पड़ रही है। कच्चे माल का आयात महंगा पड़ रहा है। ऐसे में डर यही है कि अगर रुपए की गिरावट और पेट्रोल-डीजल के दाम थामने को लेकर वक्त रहते कोई कदम नहीं उठाया गया तो कहीं महंगाई रुला न दे!