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संपादकीय: निजता का हक

पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश सहित कुछ राज्यों में अंतरधार्मिक विवाहों के मसले पर जिस तरह के उथल-पुथल मची है, उसमें यह आशंका खड़ी हो रही थी कि अगर दो बालिग अपनी पसंद और चुनाव से विवाह करना चाहते हैं तो उनका जीवन सहज कैसे रहे।

Author Updated: January 15, 2021 4:47 AM
Iner Religionसांकेतिक फोटो।

खासतौर पर उत्तर प्रदेश में कई ऐसे मामले सामने आए, जिनमें अलग-अलग धर्मों से संबंधित जोड़ों को ‘लव जिहाद’ पर बने नए कानून के तहत पुलिस की ओर से कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसके समांतर एक अहम पहलू यह है कि अब तक अपनी पसंद से अगर कोई बालिग युवक और युवती विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी करना चाहते हैं तो उनके नाम पर तीस दिन पहले सार्वजनिक तौर पर नोटिस जारी होती है, ताकि इस पर कोई आपत्ति दर्ज कर सके।

इससे आमतौर पर वैसे युवा जोड़ों के सामने कई तरह की मुश्किलें खड़ी होती रही हैं, जिनकी पसंद में उनके अभिभावकों और समाज की सहमति शामिल नहीं होती है। जाति और धर्म की कसौटी पर अलग होने की स्थिति में अक्सर ऐसे जोड़ों को किन हालात का सामना करना पड़ता है, यह किसी से छिपा नहीं है।

अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मसले पर जो फैसला सुनाया है, उसके तहत दो बालिगों के चुनाव और निजता को अधिकार के रूप में स्वीकार किया गया है। बुधवार को अदालत ने साफतौर पर कहा कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी के तीस दिन पहले जरूरी तौर पर नोटिस देने का नियम अनिवार्य नहीं है और इसे वैकल्पिक बनाना चाहिए; इस तरह का नोटिस निजता का हनन है।

सभी जानते हैं कि ऐसी स्थिति में पसंद, चुनाव और विवाह के लिए सहमति के बावजूद ऐसे जोड़ों पर किस तरह का सामाजिक दबाव पड़ता है। यह सीधे तौर पर अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने के उनके अधिकार में भी दखल है। कहा जा सकता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समाज और परिवार के दायरे से अलग अपनी पसंद से विवाह करने वाले बालिग युवाओं के हक में एक बेहद अहम फैसला दिया है। खासतौर पर ऐसे वक्त में जब कई राज्यों में भिन्न धार्मिक मत वाले जोड़ों या अपनी पसंद से विवाह के इच्छुक युवक-युवतियों के सामने कई तरह चुनौतियां खड़ी हो रही थीं।

सही है कि विवाह एक ऐसी परंपरा है, जिसमें समाज शामिल होता है। लेकिन भारतीय समाज में परंपराएं और उनके तहत प्रचलित मान्यताएं व्यवहार में इतनी ज्यादा घुली हुई हैं कि कई बार इसमें अलग तरीके अपनाने वालों को गंभीर अड़चनों का सामना करना पड़ जाता है।

विवाह के मामले में आमतौर पर वर और वधू के परिवारों के बीच आपस में सहमति होती है और इसके सार्वजनिक आयोजन से किसी पक्ष को परेशानी नहीं होती है। जबकि किन्हीं हालात में बालिग लड़के और लड़की के बीच विवाह की सहमति का आधार जब अपनी पसंद और चुनाव होता है और उसमें अभिभावक शामिल नहीं होते हैं, तब कई बार परिवार और समाज में उसे सहज स्वीकार्यता नहीं मिल पाती है। खासतौर पर जाति और धर्म के रूढ़ दायरों में जीते समुदायों में विवाह के लिए इससे इतर रास्ता अख्तियार करने वाले जोड़ों का सफर आसान नहीं होता है।

हालांकि समाज की परंपरा और मानस के समांतर देश का संविधान दो बालिग युवक-युवती की पसंद को जगह देने के लिए विशेष व्यवस्था करता है, ताकि बाधा या अड़चन की स्थिति में युवा वैकल्पिक तरीके से विवाह कर सकें। ऐसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट के ताजा फैसले से वैसे बालिग युवकों-युवतियों को बड़ी राहत मिलेगी जो विवाह के मामले में अपनी निजता बना कर रखना चाहते हैं।

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