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संपादकीय : संजीदगी का अभाव

निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए हेल्पलाइन सेवा शुरू की गई थी। इसके अलावा पुलिस वालंटियर योजना भी चलाई गई। इसके पीछे मकसद यह था कि अगर कोई महिला संकट में है और मदद की गुहार लगाती है, तो उसे तुरंत उसी स्थान पर सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

Author Published on: March 22, 2020 11:18 PM
महिलाओं के साथ अत्याचार की घटनाएं।

पिछले कुछ सालों में महिलाओं के प्रति हिंसा और बलात्कार की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। अब बलात्कार के बाद हत्या की घटनाओं में बढ़ोतरी चिंता का विषय है। इसे लेकर सरकारें महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने के संकल्प दोहराती रहती हैं। मगर हकीकत यह है कि इस मोर्चे पर वे प्राय: उदासीन ही दिखाई देती हैं। इसी का नतीजा है कि केंद्र द्वारा निर्भया कोष से जारी धन का उपयोग राज्य सरकारें नहीं कर पातीं। निर्भया बलात्कार और हत्या मामले में दोषियों को फांसी की सजा दे दी गई, इस पर स्वाभाविक ही संतोष जताया गया। पर ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए जिस तरह का वातावरण बनना चाहिए और सुरक्षा के जैसे इंतजाम होने चाहिए, वह जुटाने में सरकारें विफल दिखाई देती हैं।

निर्भया कांड के बाद यूपीए सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था चुस्त करने के मकसद से निर्भया कोष बनाया था। इसमें से राज्य सरकारों को विभिन्न मदों में धन मुहैया कराया जाता है। मगर देखा गया है कि वे राज्य सरकारें भी उस धन का समुचित उपयोग नहीं कर पाईं, जहां बलात्कार और महिलाओं पर हिंसा की घटनाएं अधिक दर्ज होती हैं। स्थिति यह है कि निर्भया कोष का पच्चीस फीसद से भी कम पैसा खर्च हो पाया है।

निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए हेल्पलाइन सेवा शुरू की गई थी। इसके अलावा पुलिस वालंटियर योजना भी चलाई गई। इसके पीछे मकसद यह था कि अगर कोई महिला संकट में है और मदद की गुहार लगाती है, तो उसे तुरंत उसी स्थान पर सहायता उपलब्ध कराई जा सके। उसे संकट से उबारा और दोषियों पर शिकंजा कसा जा सके। तब उम्मीद की गई थी कि इस चौकसी से महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वालों में कुछ भय पैदा होगा और ऐसी घटनाओं में कमी आएगी। मगर प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इन योजनाओं के लिए अबंटित धन का करीब चौबीस फीसद ही उपयोग हो पाया।

कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और दिल्ली को सबसे अधिक राशि आबंटित की गई। पर कर्नाटक ने इस निधि का केवल सात फीसद इस्तेमाल किया। दिल्ली ने पांच फीसद और तमिलनाडु केवल तीन फीसद उपयोग कर पाया। मणिपुर, सिक्किम, त्रिपुरा और दमन-दीव ने प्राप्त निधि में से एक भी रुपया खर्च नहीं किया। केवल उत्तराखंड और मिजोरम ने पचास फीसद रकम खर्च की। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अपराधियों का मनोबल तोड़ने में कितनी मदद मिली है।

जब भी बलात्कार, हिंसा और हत्या की कोई घटना होती है, सरकारें बढ़-चढ़ कर महिलाओं की सुरक्षा के दावे पेश करती हैं। दिल्ली सरकार सड़कों, यहां तक कि बसों में सीसीटीवी कैमरे लगाने, बसों में सुरक्षाकर्मी तैनात करने का दम भरती रही है, मगर इनमें से कोई भी वादा वह पूरा नहीं कर पाई, जबकि महिलाओं की सुरक्षा के लिए उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी।

इसी तरह उत्तर प्रदेश सरकार अपराधियों पर नकेल कसने के दावे तो खूब करती है, पर महिलाएं वहां कितनी सुरक्षित हैं, इसका अंदाजा वहां से जब-तब आने वाली हत्या और बलात्कार की खबरों से लगाया जा सकता है। तेलंगाना, तमिलनाडु और कर्नाटक भी इसमें पीछे नहीं हैं। यों तो सरकारें कोई योजना चलाने में धन की कमी का रोना रोती रहती हैं, पर विचित्र है कि जिन योजनाओं में उन्हें धन उपलब्ध होता है, उसे वे उपयोग नहीं कर पातीं। यह उनकी संजीदगी का अभाव नहीं तो और क्या है!

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