पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के चुने हुए जनप्रतिनिधियों का जैसा रुख देखने में आ रहा है, उससे एक बार फिर यही साफ होता है कि देश की राजनीति में अब सुविधा और तात्कालिक लाभ की प्रवृत्ति तेजी से हावी होती जा रही है। इस क्रम में शुचिता, नैतिकता और सिद्धांतों की जगह सिकुड़ती जा रही है और कुछ नेताओं के लिए सत्ता का संरक्षण तथा उसकी सुविधा ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो चुकी है। हाल ही में पश्चिम बंगाल में अट्ठावन विधायकों ने तृणमूल कांग्रेस से अलग होने की घोषणा कर दी थी।

अब पार्टी के बीस सांसदों ने भी बागी रुख अख्तियार करते हुए केंद्र में सत्तारूढ़ राजग का समर्थन करने का फैसला किया है। हालांकि अलग हुए विधायकों ने खुद को इन सांसदों से अलग बताया है, लेकिन इतना साफ है कि पश्चिम बंगाल में हार के बाद पार्टी पर ममता बनर्जी का नियंत्रण कमजोर हुआ है और सबको साथ या एकजुट रख पाना उनके लिए मुश्किल साबित हो रहा है।

तृणमूल कांग्रेस से अलग होने वाले विधायकों और सांसदों के अपने तर्क हैं और उनका कहना है कि वे पार्टी के भीतर तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र की आवाज बुलंद कर रहे हैं। सवाल है कि विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की जीत की स्थिति में भी क्या इन सांसदों और विधायकों के भीतर तानाशाही के खिलाफ लोकतंत्र की ऐसी ही फिक्र होती! लोकतंत्र के लिए इस तरह की चिंता तभी क्यों सामने दिखती है, जब चुनाव में किसी पार्टी की हार हो जाती है? यों देश के लोकतांत्रिक ढांचे में किसी नेता को यह अधिकार है कि एक पार्टी में शामिल होने या उससे अलग होने के बारे में वह खुद क्या तय करता है।

इस लिहाज से देखें, तो तृणमूल कांग्रेस से अलग होने वाले विधायकों और सांसदों के अलग-अलग समूहों का पार्टी से नाता तोड़ना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। मगर यही जब सत्ता के साथ जुड़े रहने की सुविधा से जुड़ जाता है, तो लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ-साथ कुछ सैद्धांतिक जिम्मेदारियों से जुड़े सवाल भी खड़े होते हैं। यह बेवजह नहीं है कि अलग होने वाले सांसदों को तृणमूल कांग्रेस की ओर से यह चुनौती दी गई है कि अगर उनके लिए सिद्धांत और नैतिकता की कोई अहमियत है, तो उन्हें इस्तीफा देकर फिर से चुनाव जीत कर आना चाहिए।

पिछले कुछ वर्षों से मजबूत सैद्धांतिक असहमति के बिना भी अपनी मूल पार्टी से अलग होने की एक विचित्र रिवायत-सी बनती चली जा रही है। कई नेता जिस पार्टी और उसकी नीतियों के प्रति अपनी आस्था जाहिर कर जनता से समर्थन मांगते हैं और चुनाव में जीत हासिल करते हैं, उसे एक झटके में छोड़ देने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती, बशर्ते अपेक्षया ज्यादा लाभ और सुरक्षा का आश्वासन मिले। करीब चार वर्ष पहले महाराष्ट्र में सिर्फ सत्ता के लिए शिवसेना से अलग हुए गुट ने अपनी प्रतिद्वंद्वी पार्टी के साथ खड़ा होना ज्यादा बेहतर समझा था।

विडंबना यह है कि चूंकि दल-बदल कानून के तहत दो-तिहाई सदस्यों के अलग होने को तकनीकी तौर पर गलत नहीं माना जाता, इसलिए ऐसे नेताओं के सामने कोई अड़चन पेश नहीं आती। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर जिस तरह की उथल-पुथल चल रही है, वह भारतीय राजनीति में जड़ पकड़ चुकी ऐसी राजनीति का एक और उदाहरण है, जिसमें नीतियों और सिद्धांतों के आधार पर मतदाताओं का समर्थन तथा शुचिता पर आधारित लोकतांत्रिक परंपरा की उम्मीद बेमानी हो रही है।

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पश्चिम बंगाल की सत्ता से टीएमसी बाहर हो गई है और उसके बाद से पार्टी में भगदड़ मची हुई है। पहले विधायकों में टूट हुई और अब टीएमसी के आधे से अधिक सांसद बगावत के रास्ते पर हैं। टीएमसी के लोकसभा में 28 सांसद हैं। सांसद काकोली घोष ने बगावत की शुरुआत की है और उन्होंने दावा किया है कि हमारे साथ 20 सांसद हैं, जो एनडीए के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं। 14 सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की और इसके बाद से पूरी पार्टी में हलचल मची हुई है। पार्टी दो धड़ों में बंट गई है और तीसरा गुट भी है, जिनकी स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक