यह विचित्र बात है कि जेल में बंद होने पर भी कुख्यात कैदी अपने गिरोह के जरिए आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं और कारागार प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लग पाती है! मामला चाहे नशीले पदार्थों के काले कारोबार का हो, रंगदारी वसूलने एवं लक्षित हत्या का हो या फिर अवैध हथियारों की खरीद-फरोख्त का, ऐसी तमाम वारदात की साजिश सलाखों के पीछे रहते हुए रचे जाने की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं।

हाल ही में उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद पुलिस ने हथियारों की तस्करी के एक ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ किया है, जिसे दिल्ली की तिहाड़ जेल से संचालित किया जा रहा था। गिरोह के तीन तस्करों की गिरफ्तारी के बाद यह खुलासा हुआ है। इस गिरोह का जाल इतना बड़ा था कि वे दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में हथियारों की खेप पहुंचाते थे। सवाल है कि जेल में कड़े सुरक्षा इंतजामों के बीच कोई कैदी किस तरह गिरोह को चलाता है और उसे दिशा-निर्देश देता है।

गौरतलब है कि जेल में बंद किसी कैदी की ओर से अपने गिरोह के जरिए रंगदारी, फिरौती और हत्या को अंजाम देने जैसे मामले पहले भी कई बार सामने आ चुके हैं। बावजूद इसके अभी तक ऐसा कोई तंत्र विकसित नहीं किया जा सका, जिससे ऐसे कैदियों की गतिविधियों पर स्थायी रूप से अंकुश लगाया जा सके।

पिछले दिनों अमेरिका के न्याय विभाग ने अपने आरोपपत्र में गुजरात की जेल में बंद कुख्यात अपराधी लॉरेंस बिश्नोई पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। जाहिर है कि जेल कर्मियों की लापरवाही या फिर मिलीभगत के बिना यह सब संभव नहीं हो सकता। ऐसे में यह सवाल महत्त्वपूर्ण है कि क्या एक ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने की जरूरत नहीं है, जिससे कैदियों को किसी भी दशा में संचार की सुविधाएं हासिल न हों।

तिहाड़ जेल जैसे अति सुरक्षित और आधुनिक कारागार में भी अगर कोई कैदी कई राज्यों में अवैध हथियारों की तस्करी में संलिप्त हो, तो समझा जा सकता है कि हमारे सुरक्षा तंत्र में किस तरह की खामियां हैं। जब तक जेलों में सुरक्षा और सतर्कता के मानकों पर कड़ाई से अमल नहीं होगा, तब तक इस तरह की आपराधिक गतिविधियों पर पूर्ण रूप से अंकुश नहीं लग पाएगा।