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मौत की सेल्फी

तीनों छात्र रेलवे ट्रैक पर एक साथ सेल्फी ले रहे थे, तभी ट्रेन ने उन्हें रौंद दिया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। वे सेल्फी लेने में इतने लीन थे कि उन्हें ट्रेन के आने की भनक तक नहीं लगी।

Author Published on: October 5, 2017 12:34 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

बंगलुरु के पास चलती टेÑन में सेल्फी लेने के चक्कर में तीन किशोरों की मौत हो गई। यह घटना बंगलुरु से तीस किलोमीटर दूर बिदादी नामक जगह पर हुई। तीनों की उम्र सोलह से अठारह वर्ष के बीच थी। उनमें दो किशोर बंगलुरु के नेशनल कॉलेज के छात्र थे, जबकि एक न पढ़ाई छोड़ दी थी। जैसा कि खबरों में कहा गया है कि तीनों छात्र रेलवे ट्रैक पर एक साथ सेल्फी ले रहे थे, तभी ट्रेन ने उन्हें रौंद दिया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। वे सेल्फी लेने में इतने लीन थे कि उन्हें ट्रेन के आने की भनक तक नहीं लगी। इसी शहर में पिछले हफ्ते भी सेल्फी लेने के चक्कर में एक किशोर की मौत हुई थी, और दुर्योग से वह भी नेशनल कॉलेज का ही छात्र था। मोबाइल फोन आने के साथ ही सेल्फी लेने का चलन दुनिया भर में शुरू हुआ। देखते-देखते यह स्थिति आज एक विराटरूप धारण कर चुकी है। रोजाना प्रतिक्षण लाखों लोग सेल्फी लेते हैं।

अगर यह कहा जाए कि आज हम सेल्फी-आक्रांत युग में रह रहे हैं तो गलत नहीं होगा। लेकिन कभी-कभी सेल्फी का यह रिवाज घातक रूप ले ले रहा है। सेल्फी लेने तक तो बात ठीक थी लेकिन मुश्किल तब शुरू हुई जब कुछ कुछ लोगों ने दुस्साहसिक तरीके से सेल्फी लेना शुरू किया। यानी कौन कितने खतरनाक तरीके से सेल्फी ले सकता है, इसकी एक अंधी होड़ शुरू हो गई। पिकनिट स्पॉट, समुदंर की लहरों, ऊंची चट्टानों, नदी की जलधाराओं, चलती टेÑनों आदि में बेहद खतरनाक तरीके से सेल्फी लेने को बहादुरी का कारनामा समझने वाले तमाम लोग दुनिया भर में मौत के शिकार हुए । और हद तो यह है सेल्फी लेने के चक्कर में सबसे ज्यादा मौतें भारत में हो रही हैं। हालत यह हो गई कि मुंबई प्रशासन को सोलह पिकनिक स्थलों को ‘नो-सेल्फी जोन’ घोषित करना पड़ा, क्योंकि वहां आए दिन मौतें होने लगी थीं। अब तक सेल्फी लेने के चक्कर में एक साथ सर्वाधिक सात मौतें जो हुर्इं, वह भी भारत में ही हुई। मार्च 2015 में नागपुर के पास मंगरूर में सात युवक उस समय नदी में डूब कर मर गए, जब वे नाव के किनारे लटक कर सेल्फी ले रहे थे।

एक अध्ययन में यह भी पता चला है कि मृतकों में ज्यादातर की उम्र चौबीस साल से कम रही है यानी किशोर और युवा इस चलन के ज्यादा शिकार हो रहे हैं। यह भी पाया गया कि मृतकों में लड़कियों की संख्या न के बराबर है। इसका मतलब यह भी है कि लड़कियां इस दुस्साहसिक खेल से दूर ही रहती हैं। विडंबना यह है कि इस तरह की मौतों को रोकने के लिए कोई आमफहम तरीका नहीं है। ज्यादा से ज्यादा यही हो सकता है कि कुछ ऐसे स्थल, जहां लोग सेल्फी लेने के चक्कर में खुद को खतरे में डाल देते हैं, वहां सेल्फी लेने पर रोक लगा दी जाए, जैसा कि मुंबई प्रशासन ने किया। मगर इसका क्या किया जाए कि लोग नए-नए तरीके तलाश लेते हैं। कभी टेÑन पर चढ़ जाते हैं तो कभी टेरेस से लटकने लगते हैं। इसमें जनजागरण ही एक बेहतर जरिया हो सकता है। क्योंकि, खतरनाक तरीके से सेल्फी लेना एक तरह से मौत को ही दावत देना है। ऐसा करते हुए लोग इस बात को जानते हैं कि उनके साथ कोई हादसा हो सकता है। इसके बावजूद ऐसी हरकतों से बाज नहीं आते। कुलमिलाकर यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। अगर किशोर और युवा इस तरह की स्टंटबाजी से खुद को मुक्त कर सकें तो ही इस बीमारी से मुक्ति मिल सकती है।

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