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शाबास!

टीकाकरण को लेकर निराशाजनक खबरें अक्सर सुनने-देखने को मिलती रहती हैं। जैसे टीकों की कमी, टीका लगवाने से लोगों का बचना, टीके को लेकर लोगों में फैला डर, भ्रांतियां और अंधविश्वास, सरकारी स्तर पर अभियान को लेकर उदासीनता आदि।

कोरोना मरीज की जांच करता डॉक्टर। फोटो- पीटीआई

टीकाकरण को लेकर निराशाजनक खबरें अक्सर सुनने-देखने को मिलती रहती हैं। जैसे टीकों की कमी, टीका लगवाने से लोगों का बचना, टीके को लेकर लोगों में फैला डर, भ्रांतियां और अंधविश्वास, सरकारी स्तर पर अभियान को लेकर उदासीनता आदि। इस तरह की खबरों और घटनाओं से अभियान की कामयाबी को लेकर संदेह पैदा होना कोई बड़ी बात भी नहीं है। लेकिन जब यह खबर मिले कि फलां गांव या पंचायत में सारे लोगों ने टीका लगवा लिया तो उत्साह पैदा हो जाना स्वाभाविक ही है।

और ऐसी खबर अगर उस कश्मीर से आए जहां सिर्फ हत्याएं और आतंकवाद ही खबरों में बने रहते हैं तो यह ज्यादा बड़ी बात है। कश्मीर घाटी के बांदीपोरा जिले के वेयान गांव ने जो कामयाबी हासिल की है, वह बेशक गर्व का विषय है। इस गांव की कामयाबी यह है कि यह देश का पहला गांव बन गया, जहां सभी वयस्कों ने कोरोना का टीका लगवा लिया। गांव जिला मुख्यालय से अट्ठाईस किलोमीटर दूर है। यहां तक पहुंचने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को अठारह किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। और गांव वालों ने भी बराबर का उत्साह दिखाते हुए टीके लगवाए और जीवन को सुरक्षा दी। अगर देश चाहे तो कश्मीर के इस गांव से प्रेरणा ले सकता है।

वेयान की यह कहानी बताती है कि जहां इंटरनेट की सुविधा नहीं है, लोगों के पास पहचान पत्र आदि नहीं हैं और टीका लगवाने के लिए लोग पंजीकरण नहीं करा सकते, वहां भी इस अभियान को कैसे कामयाब बनाया जा सकता है। दरअसल, जम्मू-कश्मीर सरकार ने अधिकतम आबादी के टीकाकरण की दस सूत्रीय रणनीति बनाई है। खेतों तक जा-जाकर किसानों को टीका लगाया जा रहा है। ऐसा नहीं कि यहां के लोगों में झिझक नहीं है। लेकिन टीकाकरण दल ने लोगों को समझाया और भरोसे में लिया।

इसी का नतीजा है कि पैंतालीस साल से ज्यादा के सत्तर फीसद वयस्कों को टीका लग गया। सिर्फ वेयान ही नहीं, देश के दूसरे राज्यों में भी कुछ ऐसी मिसालें मौजूद हैं। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के लालमेटा गांव के बाशिंदों ने तो बाकायदा टीका उत्सव मनाया और पूरे गांव वालों ने टीका लगवा लिया। दंतेवाड़ा जिले की एक सौ सोलह ग्राम पंचायतों में पैंतालीस साल से अधिक उम्र के सारे लोग टीके की पहली खुराक ले चुके हैं। मध्य प्रदेश के कटनी जिले के गांव बम्होरी में लोगों ने खुद ही जागरूकता अभियान चलाया और सभी ग्रामीणों को टीका लग गया। ये इस बात का भी सबूत है कि टीकाकरण को लेकर गांवों में जागरूकता शहरों से कम नहीं है।

ऐसी मुहिम सफल तभी हो पाती है जब शासन-प्रशासन चुस्त हो और स्वास्थ्यकर्मी समर्पित हों। नागरिक भी सहयोग करें। कश्मीर में आंतकी खौफ अभी भी कम नहीं है। फिर भी स्वास्थ्यकर्मी बेखौफ होकर काम कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में जान हथेली पर रख कर स्वास्थ्यकर्मी टीकाकरण में जुटे हैं। लेकिन दूसरी ओर जब यह देखने को मिलता है कि सरकारी स्तर पर घोर लापरवाही से टीके बर्बाद हो रहे हैं, कूड़ेदानों में पड़े मिल रहे हैं, तो मन पीड़ा से भर जाता है। ऐसी घटनाएं एक आपात मिशन को नाकाम करने के लिए काफी होती हैं। यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में पोलियो के खिलाफ जो अभियान चला था, वह शत-प्रतिशत सफल रहा। वेयान और ऐसे दूसरे गांव शाबासी के पात्र हैं। इनकी कामयाबी इस बात का संदेश है कि ईमानदारी से जुट जाएं तो हम कोरोना को हरा सकते हैं।

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