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संपादकीय: अमल की चुनौती

संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया को परमाणु हथियारों से निजात दिलाने वाला पहला अंतरराष्ट्रीय कानून लागू भले कर दिया हो, लेकिन यह अपने उद्देश्य में कितना सफल रहेगा, फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता।

Nuclearपरमाणु परीक्षण की फाइल फोटाे।

परमाणु हथियारों पर पाबंदी की दिशा में संयुक्त राष्ट्र की यह पहल ऐतिहासिक है और सभी देशों को न सिर्फ इसका स्वागत करना चाहिए, बल्कि इस कानून पर सख्ती और ईमानदारी से अमल करते हुए परमाणु हथियार नहीं बनाने का संकल्प करना चाहिए। पिछले एक दशक से यह प्रयास चल रहा था कि परमाणु हथियारों पर लगाम के लिए कोई समझौता हो और उसे अंतरराष्ट्रीय कानून बना कर लागू किया जाए। लेकिन इस कानून पर अभी से संकट के बादल मंडराने लगे हैं। कारण यह है कि दुनिया के परमाणु शक्ति संपन्न देशों ने ही इसका कड़ा विरोध किया है।

सबसे दुखद तो यह कि जिस जापान ने परमाणु हमले की मार झेली, वह भी इस कानून का विरोध करने वालों के साथ खड़ा है। ऐसे में सवाल यह है कि जिन देशों को परमाणु हथियार नहीं बनाने का प्रण सबसे पहले लेना चाहिए, अगर वही इसका विरोध करने लगेंगे तो दूसरे देशों को किस आधार पर परमाणु हथियार बनाने से रोक पाएंगे?

दुनिया के देशों में परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनने की होड़ ने मानव जाति के लिए बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा कर अमेरिका ने दुनिया को पहली बार महाविनाश की इस ताकत से अवगत करा दिया था। अब तो दुनिया के कुछ देशों ने हाइड्रोजन बम और उससे भी खतरनाक परमाणु हथियार बना लिए हैं। इस खतरे को बढ़ने से रोकने के लिए ही संयुक्त राष्ट्र के एक सौ बीस से ज्यादा सदस्य देशों ने यह समझौता किया था और महासभा ने 2017 में इसे स्वीकृति दे दी थी।

पर अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और इजराइल ने इस समझौते का विरोध किया। जाहिर है, इस वक्त जो परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र हैं वे अपनी जमात में और इजाफा नहीं होने चाहते और अपना दबदबा बनाए रखना चाहते हैं। अगर हर देश अपनी सुरक्षा और शक्ति संतुलन के नाम पर परमाणु हथियारों की दौड़ में बना रहेगा तो धरती को परमाणु हथियारों से मुक्त बनाने का सपना कैसे साकार होगा!

परमाणु हथियारों को पहले इस्तेमाल नहीं करने और दूसरे देशों को ऐसे हथियार बनाने से रोकने को लेकर कई संधियां हुई हैं, कई तरह की व्यवस्थाएं बनीं, लेकिन परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र ही इन्हें तोड़ते रहे। आज सबसे ज्यादा परमाणु हथियार अमेरिका और रूस के पास हैं। लेकिन परमाणु हथियारों को लेकर की गई संधियों पर दोनों ही अमल नहीं करते। फिर हर राष्ट्र चाहता है वह परमाणु ताकत बने, लेकिन पहले से मौजूद परमाणु ताकतें जब उसे रोकती हैं तो वह गुपचुप परमाणु कार्यक्रम चलाता है। उत्तर कोरिया और ईरान इसके उदाहरण हैं। यह कोई छिपी बात नहीं है कि पाकिस्तान ने कई देशों को परमाणु शक्ति संपन्न बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है।

पर एक बड़ा सवाल यह भी है कि जब अमेरिका, रूस, चीन जैसे देश परमाणु हथियार बनाने को अपना अधिकार मानते हैं तो ईरान, उत्तर कोरिया या अन्य किसी देश को क्यों यह अधिकार नहीं होना चाहिए। इसलिए जब तक दुनिया के परमाणु शक्ति संपन्न देश अपने हथियारों को नष्ट नहीं करेंगे और भविष्य में इनका निर्माण बंद नहीं करेंगे, तब तक दूसरे देशों को इस दिशा में बढ़ने से रोक पाना संभव नहीं होगा।

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