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संपादकीय: तेजाब का दंश

तेजाब से हमले की त्रासदी झेलने वाली पीड़ित लड़कियों के लिए शासकीय स्तर पर मुआवजे की राहत के लिए जो व्यवस्था की भी गई है, अगर उसमें भी लापरवाही या फिर बेईमानी की जा रही हो तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है! राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक देश भर में तेजाब से हमले के एक हजार दो सौ तिहत्तर मामलों में करीब आठ सौ पीड़िताओं को अब तक मुआवजा नहीं मिला है। आयोग ने ऐसी घटनाओं पर चिंता जताते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तुरंत संज्ञान लेने को कहा है।

crime against womenतेजाब से जली महिला। फाइल फोटो।

तेजाब से हमले की मार झेलती युवतियों या महिलाओं के जीवन के बारे में सोचना जब किसी अन्य संवेदनशील व्यक्ति के लिए बेहद तकलीफदेह होता है, तो पीड़िता के दुख और उनकी चुनौतियों का महज अंदाजा ही लगाया जा सकता है। विडंबना यह है कि लंबे समय से चिंता जताए जाने के बावजूद अब तक शासन के स्तर पर ऐसी कोई ठोस व्यवस्था अमल में नहीं आई है कि इस तरह के अपराध रोके जा सकें।

तेजाब से हमले की त्रासदी झेलने वाली पीड़ित लड़कियों के लिए शासकीय स्तर पर मुआवजे की राहत के लिए जो व्यवस्था की भी गई है, अगर उसमें भी लापरवाही या फिर बेईमानी की जा रही हो तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है! राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक देश भर में तेजाब से हमले के एक हजार दो सौ तिहत्तर मामलों में करीब आठ सौ पीड़िताओं को अब तक मुआवजा नहीं मिला है। आयोग ने ऐसी घटनाओं पर चिंता जताते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तुरंत संज्ञान लेने को कहा है। यानी जो काम सरकारों को अपनी ओर से बिना किसी के याद दिलाए खुद करना चाहिए था, उसके लिए महिला आयोग को याद दिलाना पड़ रहा है।

दरअसल, तेजाब के हमले से उपजी यह समस्या कई परतों के साथ हमारे आसपास पलती-बढ़ती रही है। उसमें एक ओर जहां समाज में स्त्री विरोधी कुंठाओं से लैस लोगों के प्रति अनदेखी या उसे आम जीवन का सहज हिस्सा मानना एक बड़ा कारण रहा है तो दूसरी ओर सरकार या संबंधित महकमों की ओर से इसकी जड़ों से संचालित अपराधों पर रोक लगा पाने में नाकामी दूसरी बड़ी वजह है।

विडंबना यह है कि घटना के हो जाने के बाद भी सरकार के हिस्से पीड़ित महिला को राहत, मुआवजा मुहैया कराने और दोषियों को सख्त सजा दिलाने का काम बचता है। लेकिन सरकार का रवैया ऐसा होता है, जिसमें संवेदनशीलता की झलक नहीं मिलती है। सवाल है कि तेजाबी हमलों को रोक पाने में नाकामी के बाद आखिर किन वजहों से इतनी बड़ी तादाद में इस अपराध की पीड़ित कुल महिलाओं में से आधे को भी समय पर मुआवजा तक देना जरूरी नहीं समझा गया? जब सरकार ने किसी नियम के तहत ये प्रावधान किए हुए हैं, तो उस पर अमल सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी है? खुद महिला आयोग के मुताबिक हालत यह है कि कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कई मामलों में पीड़ित महिलाओं को नियमित रूप से इलाज तक की सुविधा मुहैया नहीं कराई जाती।

गौरतलब है कि तेजाब से हमले की त्रासदी झेलने वाली पीड़िताओं को जितनी चोट पहुंची होती है, उसके आधार पर उनके लिए तीन लाख रुपए से आठ लाख रुपए तक का मुआवजा दिया जाता है। यह एक तरह से मामूली राहत भर है, जो उनके जीवन को हुए स्थायी नुकसान की भरपाई नहीं कर सकती है। मगर इसे देने में भी अगर सरकारें आनाकानी करें तो इससे अफसोसजनक और क्या हो सकता है!

अव्वल तो हमारे यहां अब तक सरकार या समाज की ओर से इस तरह के सामाजिक प्रशिक्षण पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझा गया है जिसमें लड़कों या पुरुषों को स्त्रियों के व्यक्तित्व, अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके, उनकी इच्छा का सम्मान करना मानसिकता और विचार का हिस्सा हो। नतीजतन, कई तरह कुंठाओं से घिरे युवक किसी लड़की के सिर्फ मना करने पर तेजाब से हमला कर देते हैं। फिर ऐसे अपराधों के बाद भी सरकार और समाज का रवैया बहुत सकारात्मक नहीं होता है। यह बेवजह नहीं है कि अब ज्यादा सख्त सजा के प्रावधान के बावजूद ऐसे अपराधों को रोक पाना एक मुश्किल काम बना हुआ है।

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