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संपादकीय: एक और राहत

भारत के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान इस वक्त करीब सोलह फीसद है। देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में जरूरी है कि यह भागीदारी और बढ़े और बिना सरकारी मदद के यह संभव नहीं है।

वित्‍तमंत्री निर्मला सीता रमण कोविड 19 के बाद आर्थिक सहायता की घोषणा करतींं हुईं। फाइल फोटो।

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयासों के तहत सरकार ने उद्योग जगत को दो लाख करोड़ रुपए का एक और पैकेज देने का जो एलान किया है, वह निश्चित रूप से राहत देने वाला कदम साबित हो सकता है। इस बार यह पैकेज आॅटोमोबाइल क्षेत्र, दूरसंचार, दवा, इलैक्ट्रॉनिक उपकरण, उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियों के लिए होगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था इस वक्त गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है और खासतौर से छोटे उद्योगों की मुश्किलें कहीं ज्यादा बड़ी हैं। अभी समस्या मांग, उत्पादन, निर्यात जैसे मोर्चों पर ज्यादा विकट है। जाहिर है, अर्थव्यवस्था को खड़ा तभी किया जा सकता जब मांग और उत्पादन का चक्र तेजी से चल निकले, और इसके लिए जरूरी है कि छोटे से लेकर बड़े सभी उद्योगों के पहिए तेजी से घूमें।

भारत के सकल घरेलू उत्पाद में विनिर्माण क्षेत्र का योगदान इस वक्त करीब सोलह फीसद है। देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में जरूरी है कि यह भागीदारी और बढ़े और बिना सरकारी मदद के यह संभव नहीं है।

सरकार ने पहला राहत पैकेज इस साल मई में जारी किया था। हालांकि पिछले साल कारपोरेट करों में भारी कटौती करते हुए उद्योग जगत को बड़ी राहत दी गई थी। लेकिन इस बार मई में बीस लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का जो प्रोत्साहन पैकेज दिया गया, वह कोरोना की मार से ढही अर्थव्यवस्था को खड़ा करने के लिए था।

पांच किस्तों में जारी किए गए इस पैकेज में तीन लाख सत्तर हजार करोड़ रुपए छोटे और मझौले उद्योगों के लिए, पचहत्तर हजार करोड़ गैरबैंकिंग वित्तीय कंपनियों के लिए, नब्बे हजार करोड़ रुपए बिजली वितरण कंपनियों के लिए और पंद्रह हजार करोड़ रुपए प्रवासी मजदूरों को मुफ्त अनाज और मनरेगा आदि के लिए भी थे।

इसके अलावा नगदी बढ़ाने के उपायों के तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक ने भी आठ लाख करोड़ रुपए का बंदोबस्त किया था। वह भी बीस लाख करोड़ रुपए के पैकेज का हिस्सा था। अब सरकार ने दो लाख करोड़ रुपए और देकर उद्योगों को राहत देने की बात कही है। इस पैकेज के पीछे मकसद यही है कि औद्योगिक गतिविधियां रफ्तार पकड़ें और मांग, उत्पादन व खपत का चक्र बने, तभी निवेश आने का रास्ता भी बनेगा।
अभी तक जितने प्रोत्साहन पैकेज आए हैं, उनके कोई खास नतीजे देखने को नहीं मिले हैं।

छोटे और मझौले उद्योगों के लिए तीन लाख सत्तर हजार करोड़ का पैकेज उद्योगों को फिर से चला पाने में कारगर साबित नहीं हुआ। एमएसएमई के आकार और संकट को देखते हुए यह कोई बहुत बड़ी रकम तो नहीं कही जा सकती। हालांकि अब सरकार भी इस बात को मान रही है कि अभी तक के प्रोत्साहन पैकेजों का असर उम्मीदों के मुताबिक नहीं दिखा है।

उद्योगों के लिए राहत देने के लिए प्रोत्साहन पैकेज जितने जरूरी हैं, उतना ही जरूरी उसे कारगर तरीके से लागू करना भी है। हाल में अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर विमल जालान ने भी इस बात पर जोर दिया है कि नए पैकेजों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण पुराने पैकेजों को सही ढंग से लागू करना है।

सबसे पहली जरूरत है रोजगार के मौके पैदा करने की, ताकि लोगों को काम-धंधा मिले और उनके हाथ में पैसा आए। इस वक्त हालत यह है कि करोड़ों नौजवान बेरोजगार हैं, पूर्णबंदी के दौरान लाखों लोगों की नौकरियां छिन गर्इं। जब पास में पैसा ही नहीं होगा तो लोग खर्च कहां से करेंगे। पैकेजों की उपयोगिता और सार्थकता तो तभी है जब सभी को इनका लाभ मिलने लगे।

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