संपादकीय: दावों के बरक्स

कायदे से जिस तरह से कोरोना के मरीजों और उनके इलाज को लेकर जैसी व्याख्याएं और चिंताजनक आंकड़े आ रहे हैं, उन्हें देखते हुए बिना किसी लापरवाही के मुहल्ले से लेकर निर्धारित अस्पतालों तक में ठोस इंतजाम और वहां ड्यूटी पर तैनात स्वास्थ्यकर्मियों और चिकित्सकों का संवेदनशील बर्ताव सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है।

Coronavirusकोरोना वायरस के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। (AP Photo)

कोरोना महामारी से निपटने के लिए सरकारों की ओर से लंबे-चौड़े दावे किए जा रहे हैं और चौकसी बरतने की खबरें आ रही हैं। लेकिन हकीकत में सरकारी इंतजाम जैसे दिख रहे हैं, उससे साफ जाहिर है कि जितनी शिद्दत घोषणाओं और दावों को लेकर दिखाई जाती है, उतनी ही संजीदगी से उन पर अमल नहीं किया जाता है।

कायदे से जिस तरह से कोरोना के मरीजों और उनके इलाज को लेकर जैसी व्याख्याएं और चिंताजनक आंकड़े आ रहे हैं, उन्हें देखते हुए बिना किसी लापरवाही के मुहल्ले से लेकर निर्धारित अस्पतालों तक में ठोस इंतजाम और वहां ड्यूटी पर तैनात स्वास्थ्यकर्मियों और चिकित्सकों का संवेदनशील बर्ताव सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है। अक्सर ऐसी खबरें आ रही हैं, जिनसे लगता है कि दावों के बरक्स सरकार ने कोरोना संदिग्धों और मरीजों को उनके हाल पर छोड़ दिया है।

कोराना के संक्रमण की जांच को लेकर एक युवक को जिस तरह की स्थितियों का सामना करना पड़ा, वह व्यवहार में इलाज और निगरानी की हकीकत को बयान करने के लिए काफी है। खबर के मुताबिक एक युवक ने अपनी व्यथा इस रूप में बताई कि उसके एक चचेरे भाई को कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई थी और इसी वजह से अपने भीतर हल्के लक्षणों को देख कर उसने भी अपनी जांच कराने का फैसला किया। लेकिन प्रयोगशालाओं को खोजने से लेकर रोहिणी स्थित एक अस्पताल तक में उसे जांच कराने में निराशा हाथ लगी।

यह हैरानी की बात है कि अगर किसी व्यक्ति को खुद ही संक्रमण होने का संदेह होता है और वह जांच के लिए हर संभव कोशिश करता है, तब भी उसे निराशा हाथ लगती है। जबकि जांच का काम अव्वल तो सरकार को खुद ही बेहद गंभीरता से कराना चाहिए, हर स्तर पर इसके इंतजाम होने चाहिए, दूसरे कि अगर कोई व्यक्ति खुद से ही जांच कराने आगे आता है तो उसे उसकी आसान पहुंच में जांच और इलाज की सुविधा होनी चाहिए थी। लेकिन प्रयोगशालाओं को खोजने से लेकर अस्पताल तक की दौड़-धूप करने के बावजूद अगर किसी कोरोना संदिग्ध को जांच के मामले में निराश होना पड़़ता है, तो इसे कैसे देखा जाएगा?

अगर वह व्यक्ति सचमुच संक्रमित होगा और उसके जरिए संक्रमण अन्य लोगों तक फैलेगा और किसी की जान चली जाएगी तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा? अगर जांच को लेकर ही इस तरह की कोताही या उदासीनता दिखाई जा रही है तो क्या इलाज को लेकर भी किसी के भीतर संदेह पैदा नहीं होगा?

सवाल है कि अगर राजधानी दिल्ली में जांच कराने निकले किसी कोरोना संदिग्ध को इस हालत का सामना करना पड़ा तो देश के दूसरे इलाकों और खासतौर पर दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में कैसी स्थिति होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है! कई जगहों से ऐसी खबरें आ चुकी हैं कि अगर किसी व्यक्ति को खुद के संक्रमित होने की आशंका हुई और वह जांच के लिए गया तो उससे महज सामान्य पूछताछ करके उसके संक्रमण से मुक्त होने का नतीजा बता दिया गया।

जबकि इस बीमारी की चपेट में आने के बाद जांच के लिए बाकायदा एक निर्धारित चिकित्सकीय प्रणाली है और उसके परिणाम के आधार पर मरीज की निगरानी, उसके एकांतवास और इलाज की समुचित प्रक्रिया शुरू की जाती है। लेकिन अगर जांच को लेकर उदासीनता की व्यवस्था रहेगी तो किस तरह कोरोना को काबू में किया जा सकेगा?

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