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तेल की कीमत

पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में जिस तरह लगातार इजाफा किया जा रहा है, उससे एक बार फिर यह सवाल उठा है कि आखिर इसका मुख्य आधार क्या है!

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (Indian Express)।

पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में जिस तरह लगातार इजाफा किया जा रहा है, उससे एक बार फिर यह सवाल उठा है कि आखिर इसका मुख्य आधार क्या है! आखिर क्यों ऐसा है कि बीते करीब दो महीने तक इसकी कीमतों को नियंत्रित या स्थिर रखा गया था और अब महंगाई की मार के बीच इसमें लगातार बढ़ोतरी की जा रही है।

क्या इससे इस आरोप को बल नहीं मिलता है कि चूंकि कुछ राज्यों में विधानसभा चुनावों के नतीजे आ चुके हैं और अब महंगाई की वजह से वोटों पर असर पड़ने या न पड़ने का मसला नहीं रह गया है, इसलिए एक बार फिर तेल की कीमतों को खुला छोड़ दिया गया है? कहने को पेट्रोल और डीजल के दाम में सिर्फ पच्चीस-पच्चीस पैसे की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन बीते एक हफ्ते से लगातार ऐसे ही इजाफे की वजह से अब देश के कुछ हिस्सों में पेट्रोल की कीमत सौ रुपए प्रति लीटर से पार कर गई है।

विभिन्न तेल कंपनियों ने जिस तरह तेल के दाम को लेकर एक तरह से खुली नीति अपना ली है और सुविधा के मुताबिक इसमें कमी और बढ़ोतरी करना शुरू कर दिया है, उससे साफ है कि ऐसे फैसलों में देश और यहां के आम लोगों की स्थिति पर कोई विचार नहीं किया जाता है।

दरअसल, पेट्रोल या डीजल की कीमतों में इस तरह इजाफे के पीछे सबसे आसान दलील यह पेश कर दी जाती है कि इसका निर्धारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम के उतार-चढ़ाव पर निर्भर होता है। लेकिन शायद ही कभी ऐसा होता है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के मूल्य में गिरावट के साथ ही देश के लोगों को मिलने वाले पेट्रोल या डीजल के दाम कम होते हैं। इसके उलट ऐसे मौके आमतौर पर देखे गए हैं, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम होने के बावजूद पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ जाती हैं और ज्यादा होने के बाद भी दाम स्थिर रखे जाते हैं।

मसलन, करीब दो महीने तक कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया चलने के बीच में कच्चा तेल महंगा हुआ था, लेकिन पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। बल्कि मामूली कटौती जरूर हुई। अब चुनाव की पूरी प्रक्रिया के गुजर जाने के बाद महज सात दिन में ही पेट्रोल 1.68 रुपए और डीजल 1.88 रुपए प्रति लीटर महंगा हो गया। अभी इसमें और वृद्धि की संभावना जताई जा रही है। सवाल है कि अगर यह बढ़ोतरी कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर होती है, तो चुनावों के दौरान इस पर नियंत्रण कैसे रहा!

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पेट्रोल और डीजल के दाम में बढ़ोतरी का असर रोजमर्रा की जरूरत की लगभग सभी चीजों पर पड़ता है। कुछ देर के लिए पेट्रोल की महंगाई को अगर निजी वाहनों की समस्या मान भी लें तो डीजल की कीमतों में इजाफा थोक से लेकर खुदरा बाजार में मिलने वाली सभी वस्तुओं की ढुलाई और खेती के खर्चे आदि तक पर सीधा असर डालते हैं। इसकी वजह से दूसरे सामान सहित लोगों की थाली तक पर महंगाई की मार पड़ती है।

पिछले एक साल से ज्यादा वक्त से महामारी और पूर्णबंदी के हालात में लगभग सभी क्षेत्र में लोगों की रोजी-रोटी बुरी तरह प्रभावित हुई है। गरीब तबके किसी तरह पेट की फिक्र में वक्त काटने की दशा में पहुंच चुके हैं और मध्यवर्ग की क्रयशक्ति में काफी कमी आई है। सरकार का यह दायित्व है कि वह देश में संकट के स्तर को देखते हुए वैसे क्षेत्रों में भी दखल देकर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश करे, जिसके नियमन को उसने निजी क्षेत्र या फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार के भरोसे छोड़ दिया है।

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