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केन का जीवन

केन के जलप्रवाह में काफी कमी को देखते हुए अब उत्तर प्रदेश की पुलिस ने नदी के तटीय इलाकों की निगरानी शुरू कर दी है। हालत यह है कि नदी के किनारे हथियारों से लैस पुलिसकर्मी खड़े होकर दूरबीनों के जरिए नजर रख रहे हैं।

riverप्रतीकात्मक तस्वीर (एक्सप्रेस फाइल)

दुनिया की ज्यादातर नदियां अपने तटवर्ती इलाकों के लिए जीवनदायिनी रही हैं। सभ्यताओं के विकास में नदियों का क्या योगदान रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन विडंबना यह है कि जो मानव सभ्यताएं नदियों से जीवन पाती रही हैं, उन्हीं की वजह से आज बहुत सारी नदियों का अस्तित्व मुश्किल में है। बुंदेलखंड के इलाके में बहने वाली केन नदी आज जिस संकट से दो-चार है, उसका हल वक्त रहते निकाला जा सकता था। लेकिन अफसोस की बात यह है कि हम और हमारी सरकारें तब तक किसी समस्या पर गौर करना जरूरी नहीं समझतीं, जब तक पानी नाक के ऊपर न बहने लगे। जो केन नदी समूचे बुंदेलखंड इलाके की जीवन-रेखा के तौर पर देखी-जानी जाती थी, आज हालत यह है कि उसकी धारा सूखने की राह पर है और उसे अकाल मौत से बचाने के लिए अब जाकर एक ओर सरकारी तंत्र थोड़ा सक्रिय होता दिख रहा है तो दूसरी ओर सामाजिक स्तर पर भी कुछ पहलकदमी हुई है। अफसोस की बात यह है कि इस तरह की कवायदें वक्त पर शुरू नहीं हो पातीं।

गौरतलब है कि केन के जलप्रवाह में काफी कमी को देखते हुए अब उत्तर प्रदेश की पुलिस ने नदी के तटीय इलाकों की निगरानी शुरू कर दी है। हालत यह है कि नदी के किनारे हथियारों से लैस पुलिसकर्मी खड़े होकर दूरबीनों के जरिए इस बात पर नजर रख रहे हैं कि किसी गतिविधि की वजह से केन के जलप्रवाह में बाधा तो नहीं आ रही है। खासतौर पर अवैध खनन कारोबारी दूरदराज के दुर्गम इलाकों में नदी की धारा को रोक कर बालू का खनन करने लगते हैं। इस वजह से शहरी इलाकों में पानी की आपूर्ति के लिए नदी में बने ‘इन-टेक-वेल’ तक पानी नहीं पहुंच पाता है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस केन की हालत क्या हो चुकी है, जिसके पानी पर बड़ी तादाद में लोगों की निर्भरता है। गर्मी के मौसम में पहले ही इस नदी में जलप्रवाह मामूली रह जाता है। ऐसे में भी अवैध खनन से लेकर तटीय ग्रामीण इलाकों के लोग नदी के किनारे सब्जी आदि की खेती की सिंचाई के लिए प्रवाह रोकते हैं। जाहिर है, इसका सीधा असर जरूरतमंद क्षेत्रों में आपूर्ति के लिए पानी के संग्रह पर असर पड़ता है।

यानी कभी जिस नदी के पानी से जिला मुख्यालय के अलावा करीब पचास गांवों के किसान अपनी प्यास बुझाते थे, वह केन आज सूखती जा रही है। इस नदी की गिनती सबसे स्वच्छ नदियों में की जाती थी, जिसके पानी का उपयोग लोग पेयजल के रूप में करते रहे हैं। नदी और इसके तट पचास से ज्यादा प्रकार के पेड़, वनस्पति और जीव-जंतु से समृद्ध रहे हैं। लेकिन आज केन के तट पर बसे कई शहरों का गंदा पानी सीधे नदी में जा रहा है। यही नहीं, इन शहरों के चिकित्सा और विषैले अपशिष्ट भी नदी में बहा दिए जाते हैं। इसके अलावा, बालू माफियाओं के अवैध खनन से नदी की दशा और दिशा पूरी तरह बदल चुकी है। यही वजह है कि केन को बचाने के लिए किसानों ने भी अपने स्तर पर आंदोलन छेड़ा था। अब इस मसले पर सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और बुद्धिजीवियों ने भी पहल की है और इसके मद्देनजर सोशल मीडिया पर ‘मैं भी भगीरथ’ नाम से मुहिम की शुरुआत की है। इस मुहिम के जरिए केन नदी को बचाने के मकसद से लोगों के बीच जागरूकता फैलाई जा रही है। वक्त रहते अगर केन को पहले के स्वरूप में वापस लाया जा सके तो यह समूचे इलाके के हित में होगा, अन्यथा इसका खमियाजा समाज को ही भुगतना पड़ेगा।

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