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संपादकीयः संयुक्त राष्ट्र में सुधार

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति पर इस मकसद के साथ की गई थी कि आने वाली दुनिया को और ऐसे युद्ध न देखने पड़ें। इसलिए दुनिया में शांति स्थापित करने और देशों के बीच विवादों को मिल-बैठ कर सुलझाने के लिए यह वैश्विक मंच बना था।

जरूरतों के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र में सुधार के मुद्दे को भारत ने जिस पुरजोर तरीके से उठाया है।

बदलते वक्त की जरूरतों के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र में सुधार के मुद्दे को भारत ने जिस पुरजोर तरीके से उठाया है, उसका सरोकार पूरे विश्व से है। दुनिया के ज्यादातर देश लंबे समय से इस वैश्विक संस्था में सुधार की मांग करते रहे हैं, ताकि इसकी भूमिका को तर्कसंगत व प्रभावी बनाया जा सके। संयुक्त राष्ट्र के पचहत्तर साल पूरे होने के मौके पर महासभा की एक बैठक को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कहा कि आज यह वैश्विक निकाय जिस सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा है, वह इसकी विश्वसनीयता का है और विश्वसनीयता में यह कमी इसमें उन सुधारों के अभाव का परिणाम है, जिनकी लंबे समय से जरूरत महसूस की जा रही है। ऐसे में इस सर्वोच्च वैश्विक निकाय के सदस्य देशों को इस बारे में अब गंभीरता से सोचने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के बाद से आज संपूर्ण विश्व पूरी तरह बदल चुका है। महाशक्तियों के मायने बदल गए हैं। कई देश नई सैन्य और आर्थिक ताकत के रूप में उभरे हैं। इसलिए इस बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में सबसे ज्यादा जरूरत शक्ति के संतुलन की महसूस की जा रही है, और यह तभी संभव होगा जब संयुक्त राष्ट्र जैसा वैश्विक निकाय अपनी भूमिका पर खरा उतरेगा।

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति पर इस मकसद के साथ की गई थी कि आने वाली दुनिया को और ऐसे युद्ध न देखने पड़ें। इसलिए दुनिया में शांति स्थापित करने और देशों के बीच विवादों को मिल-बैठ कर सुलझाने के लिए यह वैश्विक मंच बना था। लेकिन आज हम देख रहे हैं कि दुनिया में मुश्किल हालात पैदा हो गए हैं। मध्यपूर्व और पश्चिम एशिया का संकट किसी से छिपा नहीं है। सीरिया, लेबनान, फिलस्तीन जैसे संकट बता रहे हैं कि दुनिया के कुछ खास विकसित देशों, जिनका कि संयुक्त राष्ट्र में हर तरह से दबदबा है, ने इस क्षेत्र को युद्ध के अखाड़े में तब्दील कर डाला है। अफगानिस्तान तो दो महाशक्तियों- रूस और अमेरिका का लंबे समय तक युद्ध स्थल बना रहा। दक्षिण अमेरिकी देशों से लेकर अफ्रीका और एशियाई देश जिस अंदरूनी और बाहरी संकट का सामना कर रहे हैं, वह कोई कम भयावह नहीं है। चिंता की बात यह है कि दुनिया में इस तरह के संकट कम होने के बजाय बढ़ते जा रहे हैं। और यह सब तब हो रहा है जब हमारे पास संयुक्त राष्ट्र जैसा वैश्विक मंच है। इसलिए मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर एक निगरानी संस्था होते हुए भी दुनिया के कुछ देश क्यों बेलगाम होते जा रहे हैं और कल्याण की भावना को नजरअंदाज करते हुए साम्राज्यवादी नीतियों पर तेजी से चल रहे हैं। आखिर ऐसे में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका क्या रह जाती है !

इससे कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च अंग सुरक्षा परिषद सहित दूसरे निकायों में बदलाव अब अपरिहार्य हो गया है। सवाल है कि जब पिछले साढ़े सात दशक में पूरा वैश्विक परिदृश्य बदल चुका है तो स्थायी सदस्यों की संख्या में विस्तार क्यों नहीं होना चाहिए, क्यों नहीं सैन्य और आर्थिक शक्ति के रूप में नए उभरते देशों को स्थायी सदस्य के रूप में मौका दिया जाना चाहिए। हकीकत तो यह है कि यह संस्था कुछ बाहुबली देशों की जागीर बन कर रह गई है और वीटो के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए ये स्थायी सदस्य देश अपने हितों को साधते आ रहे हैं। अगर सुरक्षा परिषद सहित दूसरे निकायों में दुनिया के दूसरे देशों की भूमिका बढ़ती है, तभी संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है।

 

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