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संपादकीयः हिंदी का दायरा

देश के आजाद होने के बाद केंद्र के स्तर पर हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो मिला, लेकिन राज्यों की स्थानीयता और क्षेत्रीय पहचान के मद्देनजर इसे थोपने की कोशिश नहीं हुई।

उर्दू और अंग्रेजी के अलावा अब कश्मीरी, डोगरी और हिंदी को भी वहां की आधिकारिक भाषाओं की सूची में शामिल किया जाएगा।

भारत एक बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक देश है, इस नाते सभी क्षेत्रों की अपेक्षाओं का खयाल रखना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। लेकिन इसके साथ-साथ आजादी के समय से ही ऐसे उपायों की खोज और उन पर काम लगातार जारी रहा है जो समूचे देश को एक सूत्र में जोड़ सके। इस मामले में अलग-अलग स्तर पर राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलकदमियों के अलावा भाषा के रूप में हिंदी को एक अहम जरिया माना गया, जो देश के एक छोर से दूसरे छोर तक के लोगों को एक-दूसरे से जोड़ने में सहायक सिद्ध हो। देश के आजाद होने के बाद केंद्र के स्तर पर हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो मिला, लेकिन राज्यों की स्थानीयता और क्षेत्रीय पहचान के मद्देनजर इसे थोपने की कोशिश नहीं हुई। हालांकि यह उम्मीद जरूर की जाती रही कि अलग-अलग राज्यों में राजकाज की भाषा को लेकर धीरे-धीरे एकरूपता आएगी और इस पर विवाद की गुंजाइश को कम किया जा सकेगा।

इसी क्रम में जम्मू-कश्मीर में राजकाज की भाषा के रूप में हिंदी को भी जगह दिलाने के मकसद से केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार को एक विधेयक को मंजूरी दे दी, जिसके तहत उर्दू और अंग्रेजी के अलावा अब कश्मीरी, डोगरी और हिंदी को भी वहां की आधिकारिक भाषाओं की सूची में शामिल किया जाएगा। हालांकि इससे संबंधित विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं आई है, लेकिन इससे संबंधित खबरों के मुताबिक राजभाषा विधेयक-2020 में एक व्यवस्था यह है कि कश्मीरी, डोगरी और हिंदी को जम्मू-कश्मीर की आधिकारिक भाषाओं की सूची में डाल दिया जाएगा। दरअसल, कश्मीरी और डोगरी को लेकर क्षेत्र की जनता की यह मांग लंबे समय से रही है, लेकिन अब से पहले इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका था। जबकि एक रिपोर्ट के मुताबिक वहां डोगरी बोलने वालों की संख्या करीब पचास लाख और कश्मीरी बोलने वालों की तादाद पैंतालीस लाख से ज्यादा है। जाहिर है, अब कश्मीरी, डोगरी के साथ-साथ हिंदी को भी इसमें शामिल करना न केवल स्थानीयता के तकाजों का खयाल रखने, बल्कि जम्मू-कश्मीर को राष्ट्रीय मुख्यधारा में और करीब लाने का जरिया बन सकता है।

हालांकि इस मसले पर ऑल पार्टी सिख को-ऑर्डिनेशन कमिटी की ओर से उठाया गया यह सवाल भी अहम है कि अनुच्छेद-370 के प्रावधानों की समाप्ति से पहले पंजाबी भाषा जम्मू-कश्मीर के संविधान का हिस्सा थी। लेकिन अब जम्मू-कश्मीर की आधिकारिक भाषा में पंजाबी को शामिल न करके सरकार अल्पसंख्यक विरोधी रवैया दर्शा रही है! लेकिन जहां तक हिंदी का सवाल है, यह विचित्र है कि आजादी के बाद से अब तक जम्मू-कश्मीर में हिंदी को आधिकारिक भाषाओं के बीच जगह नहीं मिल सकी थी। जबकि लगभग समूचे इलाके में पर्यटकों से लेकर दूसरे हिंदीभाषी राज्यों से जाने वाले कामगारों के बीच भी संपर्क सूत्र के रूप में हिंदी एक अहम भूमिका निभाती रही है। फिर स्थानीय कश्मीरी लोगों को भी हिंदी के इस्तेमाल पर कभी आपत्ति नहीं रही। इस लिहाज से देखें तो अगर हिंदी को कश्मीरी और डोगरी के साथ आधिकारिक भाषा के तौर पर जगह देने की पहलकदमी हुई है तो यह न सिर्फ हिंदी का दायरा बढ़ाने, बल्कि स्थानीय भाषाओं को भी राष्ट्रीय संपर्कों के दायरे में लाने की कोशिश साबित हो सकती है।

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