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अभिव्यक्ति के हक में

बंगाली फिल्म ‘भविष्योतेर भूत’ बीती फरवरी में ही रिलीज हो गई थी, लेकिन राजनीतिक वजहों से अगले ही दिन राज्य के सभी सिनेमाघरों से उसे हटवा दिया गया था।

Author April 13, 2019 2:36 AM
सुप्रीम कोर्ट ।(picture source indian express file)

एक लोकतांत्रिक प्रणाली में कोई सरकार, राजनीतिक पार्टी या अन्य समूह सिर्फ इसलिए किसी कलाकृति के प्रदर्शन को बाधित करते हैं कि उससे किसी राजनीति की हकीकत पर चोट पहुंचती है तो यह चिंता की बात है। खासतौर पर जब हमारे देश के संविधान में अपनी बात कहने और अभिव्यक्ति को एक अधिकार के रूप में देखा गया है तब यह समझना मुश्किल हो जाता है कि इसमें बाधा पहुंचाने वाले लोग कानूनों को धता बताने की हद तक कैसे चले जाते हैं। इसके बाद अदालत ही है, जहां इस तरह की प्रवृत्तियों को कसौटी पर रखा जा सकता है। इसके मद्देनजर देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने एक फिल्म के प्रदर्शन को बाधित करने की कोशिश के लिए पश्चिम बंगाल सरकार पर भारी जुर्माना लगा कर एक सख्त संदेश दिया है। गौरतलब है कि बंगाली फिल्म ‘भविष्योतेर भूत’ बीती फरवरी में ही रिलीज हो गई थी, लेकिन राजनीतिक वजहों से अगले ही दिन राज्य के सभी सिनेमाघरों से उसे हटवा दिया गया था। हालांकि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को फिल्म के प्रदर्शन कराने का निर्देश दिया था। लेकिन उल्टे उसमें बाधा पैदा की गई। इसी से नाराज अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार पर बीस लाख रुपए का जुर्माना लगाया है।

माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल पार्टी की सरकार की ओर से इस फिल्म के प्रदर्शन में अड़चन खड़ी करने के पीछे मुख्य वजह यह है कि इसमें राजनीतिक व्यंग्य का सहारा लेकर अलग-अलग पार्टियों को कठघरे में खड़ा किया गया है और इनमें तृणमूल कांग्रेस भी शामिल है। कायदे से फिल्म पर हमला करने या इसे रोकने के बजाय तृणमूल कांग्रेस और राज्य में उसकी सरकार को यह सोचना चाहिए था कि लोकतांत्रिक दायित्व को पूरा करने में कहां कमी रह गई। सीधे उसके प्रदर्शन पर रोक लगा कर उसने यही साबित किया कि देश की लोकतांत्रिक परंपराओं और कानूनी व्यवस्था की उसे परवाह नहीं है। लेकिन इस मसले पर दायर की गई याचिका पर स्पष्ट निर्देश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यही स्थापित करने की कोशिश की है कि किसी फिल्म का प्रदर्शन अभिव्यक्ति के अधिकार के तहत आता है और उसे बाधित करना कानूनी तौर पर गलत है। अदालत ने कहा कि यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है कि किसी भी व्यक्ति विशेष की अभिव्यक्ति की आजादी को दबाया नहीं जाए, लेकिन फिल्म के प्रदर्शन को बार-बार रोकने की कोशिश करते हुए सरकार उससे मुकर गई।

अभिव्यक्ति के कला माध्यमों पर सत्ता की ओर से खड़ी की गई बाधाएं या उन पर हमला कोई नई बात नहीं है। अक्सर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं जब किसी पेंटिंग, कलाकृति या फिल्म के प्रदर्शन को इसलिए बाधित किया गया कि खास समूहों ने उस पर अपनी भावनाओं के आहत होने की वजह से आपत्ति जताई थी। कई बार किसी फिल्म के प्रदर्शन को रोकने से लेकर सिनेमा घरों पर हिंसक हमला करने तक की कोशिशें की गर्इं। लेकिन ऐसा करने वालों ने यह सोचने या समझने की जरूरत नहीं समझी कि अगर फिल्म में कुछ आपत्तिजनक है तो इसके बारे में उसका दर्शक खुद तय सकता है। जिस तरह एक व्यक्ति को अपनी राय जाहिर करने का हक है, उसी तरह एक फिल्म निर्माता को अपनी कहानी पर फिल्म बनाने और उसे जनता के बीच प्रदर्शित करने का अधिकार है। इसे संविधान में दर्ज अभिव्यक्ति के अधिकार के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह दर्शकों के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वे किसी फिल्म को देखते हुए उससे कितना प्रभावित होते हैं या उसमें मौजूद कहानी पर कैसे सवाल उठा पाते हैं।

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