scorecardresearch

संपादकीय: चिंता के आंकड़े

पर्यटन और इससे जुड़े दूसरे क्षेत्रों के कारोबारों की हालत चौपट हो चुकी है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि देश के सरकारी खजाने की हालत बिगड़ती जा रही है। बढ़ता सरकारी खर्च और राजकोषीय घाटा बड़े संकट की ओर इशारा कर रहे हैं।

संपादकीय: चिंता के आंकड़े
महामारी के प्रकोप के बीच गिरती अर्थव्यवस्था चिंता का विषय है।

सरकार ने सोमवार को आर्थिक विकास दर के जो आंकड़े जारी किए, उनसे देश की अर्थव्यवस्था की हकीकत सामने आ गई है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल से जून 2020) के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 23.9 फीसद की भारी गिरावट आई है।

हालांकि यह हैरानी की बात इसलिए नहीं है क्योंकि इस पहली तिमाही में देश पूर्णबंदी की गिरफ्त में रहा और औद्योगिक गतिविधियों से लेकर छोटे स्तर तक पर काम बंद रहा। यह तभी साफ हो चला था कि आने वाले दिनों में देश की अर्थव्यवस्था दुश्चक्र में फंसने जा रही है। लेकिन तब सरकार की ओर से बार-बार इस तरह के दावे किए जाते रहे कि अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है, कोई खतरा नहीं है और जल्दी ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। यह हकीकत को नकारने जैसी बात थी।

देश के राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय (एनएसओ) ने जीडीपी के जो ताजा आंकड़े जारी किए हैं, उनसे पता चल रहा है कि हमारे उद्योग किस मरती-झुरती हालत में पहुंच गए हैं और उत्पादन की स्थिति क्या है। एनएसओ के आंकड़ों को देख कर क्या कोई यह उम्मीद लगा पाएगा कि हम इस संकट से जल्द ही उबर जाएंगे?

इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले तीन महीनों में जो हालात बिगड़े हैं, उनके पीछे कोरोना संकट बड़ा कारण रहा है। लेकिन इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि भारत की अर्थव्यवस्था पिछली आठ तिमाहियों से नीचे आ रही है।

अगर पिछले दो साल में अर्थव्यवस्था में गिरावट का दौर नहीं रहता, तो शायद भारत पूर्णबंदी से उत्पन्न आर्थिक संकट को झेल जाता। लेकिन अब अर्थव्यवस्था पर जो मार पड़ रही है, वह एक तरह से दोहरी मार है। अगर कृषि क्षेत्र को छोड़ दें, तो शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा होगा, जिसमें उत्पादन संबंधी कोई काम हुआ होगा। निर्माण, विनिर्माण, बिजली, रिफाइनरी, कोयला, सीमेंट, खनन, सेवा क्षेत्र, पर्यटन जैसे क्षेत्रों की हालत खराब है। सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले निर्माण क्षेत्र का ग्राफ पचास फीसद से ज्यादा नीचे चला गया। अर्थव्यवस्था और रोजगार में चालीस फीसद से ज्यादा भागीदारी रखने वाला सेवा क्षेत्र ठप पड़ा है।

पर्यटन और इससे जुड़े दूसरे क्षेत्रों के कारोबारों की हालत चौपट हो चुकी है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि देश के सरकारी खजाने की हालत बिगड़ती जा रही है। बढ़ता सरकारी खर्च और राजकोषीय घाटा बड़े संकट की ओर इशारा कर रहे हैं।

अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए सरकार ने भले इक्कीस लाख करोड़ रुपए के पैकेज जारी किए हों, लेकिन जो तस्वीर सामने आ रही है, वह निराशा पैदा करने वाली है। अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाला असंगठित क्षेत्र और मध्यवर्ग जिन संकटों से जूझ रहा है, वे कोई मामूली नहीं हैं। काम-धंधे बंद होने से आज करोड़ों लोगों के सामने रोजी-रोजी का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में पैसा नहीं होगा तो लोग खर्च क्या करेंगे, बाजार में मांग कैसे निकलेगी, कारखानों और छोटे उद्योगों में उत्पादन कैसे शुरू होगा, यह बड़ा सवाल है। जिस तरह के हालात बन गए हैं, उनसे निकल पाना कोई आसान काम नहीं है।

कोरोना महामारी ने दुनिया के तमाम देशों की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डाला है, लेकिन जितनी गिरावट भारत की जीडीपी में आई है, वह एक हद तक अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन का भी परिणाम है। आने वाले वक्त को लेकर लोगों के मन में भारी अनिश्चितता और खौफ की स्थिति बन गई है। जब तक लोगों को काम नहीं मिलेगा और हाथ में पैसा नहीं आएगा, तब तक जीडीपी के इसी तरह के चिंताजनक आंकड़े देखने को मिलते रहेंगे।

पढें संपादकीय (Editorial News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.

First published on: 02-09-2020 at 02:10:48 am