अनदेखी का तंत्र

किसी समस्या से पार पाने के लिए केवल नियम-कायदे बना देना भर उस मसले के हल का पर्याय नहीं हो सकता।

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सांकेतिक फोटो।

किसी समस्या से पार पाने के लिए केवल नियम-कायदे बना देना भर उस मसले के हल का पर्याय नहीं हो सकता। अगर अमल के स्तर पर किसी नियम को ईमानदारी से लागू नहीं किया जाता है तो वह ज्यादा जटिल स्थितियां पैदा कर सकता है। मसलन, भ्रष्टाचार से निपटने के लिए लोकपाल नामक संस्था को अस्तित्व में आने से पहले किस जद्दोजहद से गुजरना पड़ा, वह जगजाहिर है। लेकिन आज भी अगर इस संस्था के ढांचे और कामकाज को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो इससे एक बात साफ है कि कोई कानून अपने आप में मुकम्मल हो सकता है, लेकिन अगर उसे लागू करने वालों की मंशा ठीक नहीं है या फिर इच्छाशक्ति में कमी है तो उसका कोई मतलब नहीं होगा। देश में लंबी लड़ाई के बाद अस्तित्व में आई भ्रष्टाचार विरोधी संस्था लोकपाल का गठन तो हो गया, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार को सिर्फ इस बात से मतलब है कि यह महज अपने औपचारिक स्वरूप में काम करती रहे और इसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकले! वरना क्या वजह है कि दो साल से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद अब तक लोकपाल जैसी संस्था में शिकायतों की जांच के लिए अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गई!

गौरतलब है कि भ्रष्टाचार की व्यापक समस्या पर काबू पाने के लिए चले आंदोलन में और उससे पहले भी लोकपाल के लिए लंबी लड़ाई चली। फिर लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013 के तहत सरकार के तंत्र में लोकसेवकों के भ्रष्टाचार पर रोक के लिए केंद्र में लोकपाल एवं राज्यों में लोकायुक्त संस्था गठित करने का प्रावधान किया गया। एक संस्था के रूप में लोकपाल के अस्तित्व में आने के बाद ऐसे नियमित जांच निदेशक की नियुक्ति की जरूरत थी, जो लोकपाल की ओर से भेजी गई भ्रष्टाचार की शिकायतों की शुरुआती जांच कर सके। लेकिन अब सूचनाधिकार कानून के तहत सामने आई एक जानकारी के तहत यह बताया गया है कि लोकपाल के अस्तित्व में आने के दो साल बाद भी केंद्र सरकार ने जांच निदेशक की नियुक्त नहीं की है। सिर्फ इतने भर से यह समझा जा सकता है कि लोकपाल के निर्बाध कामकाज को लेकर सरकार कितनी उदासीन है या फिर उपेक्षा-भाव रखती है। सवाल है कि हर थोड़े दिनों पर भ्रष्टाचार को देश की सबसे बड़ी समस्या बताने वाली सरकारें इससे लड़ने वाले ढांचे को ठोस और कारगर बनाने के लिए वाजिब पहलकदमी क्यों नहीं कर रही हैं!

आंकड़ों के मुताबिक लोकपाल को बीते करीब साल भर में सौ से ज्यादा शिकायतें मिलीं। जबकि 2019-20 के दौरान एक हजार चार सौ सत्ताईस शिकायतें मिली थीं। सवाल है कि अगर किसी तरह लोकपाल के पास पहुंचे मामलों की जांच तक के लिए उचित तंत्र या अधिकारी मौजूद नहीं हैं, तो ऐसी शिकायतों का हश्र क्या होगा? विडंबना यह है कि मुख्यधारा की राजनीति में जो पार्टियां भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी समस्या बता कर जनता को उससे मुक्ति दिलाने का भरोसा देती हैं, वही सत्ता में आने के बाद इस समस्या के प्रति लगभग उदासीन हो जाती हैं। अफसोसनाक यह भी है कि भ्रष्टाचार के लिए सरकारों को कठघरे में खड़ा करने वाली विपक्षी पार्टियां भी एक कारगर और प्रभावी तंत्र के रूप में लोकपाल के काम करने के लिए सरकार से सवाल करना जरूरी नहीं समझती हैं! ऐसे में आज भी अगर कहीं नियुक्ति तो कहीं ठोस अनुपालन के अभाव में लोकपाल कानून बदहाल दिख रहा है तो यह कोई हैरानी की बात नहीं है। सवाल है कि भ्रष्टाचार पर रोक लगाने वाले तंत्र की इस स्तर की अनदेखी के समांतर क्या इस समस्या से पार पाने की उम्मीद की जा सकती है!

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