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संपादकीय: बंदी में असहज

दिन भर घर में बंद रह कर टीवी, मोबाइल, इंटरनेट गेम के जरिए समय बिताने की वजह से बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, तनाव, अवसाद, अनिद्रा जैसी परेशानियां देखी जा रही हैं। इसके अलावा उन लोगों में भी ये सब विकृतियां देखी जा रही हैं, जो घर में रह कर दफ्तर के काम निपटा रहे हैं।

Author Published on: April 30, 2020 5:44 AM
कोरोना वायरस लॉकडाउन का असर सबसे ज्यादा दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ा है। (एक्सप्रेस फोटो)

यह तो सही है कि दिनचर्या में बदलाव का असर स्वभाव पर भी पड़ता है, पर इन दिनों जब देश में पूरी तरह तालाबंदी है, लोगों के मन पर कुछ अधिक नकारात्मक प्रभाव नजर आने लगा है। बच्चे दिन भर घरों में बंद रहने को मजबूर हैं। स्कूल बंद हैं, खेलने की जगहें बंद हैं, दोस्तों से मिलने-बतियाने पर पाबंदी है। ऐसे में उनके पास दिन भर टीवी, इंटरनेट, मंोबाइल का ही सहारा है। पहले ही टीवी और मोबाइल पर अधिक समय बिताने की वजह से बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ते प्रतिकूल प्रभाव को लेकर चिंताएं जताई जाती रही हैं।

मोबाइल की लत के चलते उनमें आने वाली मानसिक विकृतियों पर अंकुश लगाने के मकसद से कई अस्पतालों में विशेष केंद्र तक खोले गए हैं। पर इस तालाबंदी के समय में माता-पिता भी उन्हें रोकें, तो किस बहाने, यह बड़ी समस्या है। दिन भर घर में बंद रह कर टीवी, मोबाइल, इंटरनेट गेम के जरिए समय बिताने की वजह से बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, तनाव, अवसाद, अनिद्रा जैसी परेशानियां देखी जा रही हैं। इसके अलावा उन लोगों में भी ये सब विकृतियां देखी जा रही हैं, जो घर में रह कर दफ्तर के काम निपटा रहे हैं।

हालांकि कई स्कूलों ने आनलाइन कक्षाएं शुरू कर दी हैं। इस तरह बच्चों को घर पर बैठ कर पढ़ने को प्रेरित किया जा रहा है। पर रोज सुबह उठ कर स्कूल जाने, अपने दोस्तों के साथ धमा-चौकड़ी करने, खेलने-कूदने का अवसर मिलता था, उससे मस्तिष्क और शरीर में थकान पैदा होती थी, वह घर बैठे आनलाइन पढ़ने से नहीं हो पा रही। फिर यह सुविधा सभी बच्चों को उपलब्ध नहीं है, बहुत सारे बच्चे इससे वंचित हैं। यह भी कि घर में कक्षा का वातावरण नहीं मिल पाता, इसलिए भी उनका पढ़ाई में वैसा ध्यान केंद्रित नहीं हो पाता। पर अध्यापक उन्हें पढ़ा और गृहकार्य भी दे रहे हैं। हालांकि दिनचर्या बदलने से बच्चे गृहकार्य करने में दिलचस्पी नहीं दिखाते, फिर माता-पिता की डांट पड़ती है। इससे भी उनमें चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है।

शारीरिक गतिविधियां न होने, अपने दोस्तों के साथ खेलने-कूदने का अवसर न मिलने का प्रभाव उनकी भूख और नींद पर पड़ रहा है। रात को देर तक जाग कर मोबाइल या टीवी पर आंखे गड़ाए रखना और फिर सुबह देर तक सोते रहना, उनमें नई आदत विकसित हो गई है। इससे उनके चयापचय का संतुलन भी बिगड़ रहा है। यही हाल उन लोगों का है, जो घरोें में बैठ कर दफ्तर के काम कर या कुछ नहीं कर रहे हैं। जो लोग पहले से कुछ समस्याओं से ग्रस्त हैं, उनकी परेशानियां और बढ़ गई हैं।

हालांकि मनोचिकित्सक और शरीर विज्ञानी सलाह दे रहे हैं कि इस तालाबंदी के दौरान लोग घरों में ही व्यायाम, योग आदि करें और प्रसन्न रहने की कोशिश करें। पर मनुष्य का स्वभाव है आजाद विचरण करना। जब ऐसा नहीं हो पाता, लंबे समय तक उसका घर से बाहर निकलना बंद कर दिया जाता है, तो वह बीमार अनुभव करने लगता है। पर इस संकट के समय में बाहर निकलना खतरे से खाली नहीं।

इसलिए लोगों को नए सिरे से अपनी दिनचर्या बनानी और उसके अनुसार खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करनी चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार खुद को बदलना भी मनुष्य का स्वभाव है, सो नई दिनचर्या बना कर बच्चों को और खुद को व्यस्त, स्वस्थ और प्रसन्न रखना एक रचनात्मक अनुभव देगा।

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