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संपादकीय: महंगाई का सूचकांक

खाद्य वस्तुओं में खासतौर पर सब्जियों की कीमतों में जिस तेजी से बढ़ोतरी शुरू हुई, वह अप्रत्याशित है। हरी सब्जियों की कीमतें बहुत सारे लोगों की पहुंच से बाहर हो रही हैं और जो आलू लोगों की थाली का सहारा रहा है, वह भी अब बेलगाम होता जा रहा है।

आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है।

पिछले कई महीने से वस्तुओं की कीमतें जिस पैमाने पर चल रही थीं, वह पहले ही आम लोगों के लिए परेशानी का सबब थीं। अब एक बार फिर थोक महंगाई दर में बढ़ोतरी के जो आंकड़े आए हैं, वे चिंता पैदा करते हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में देश में महंगाई दर बढ़ कर 0.16 फीसद पर पहुंच गई, जबकि जुलाई में यह ऋणात्मक 0.58 फीसद पर थी।

गौरतलब है कि थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति की दरें बाजार में सामान्य तौर पर कुछ समय के लिए वस्तुओं की थोक कीमतों में उतार-चढ़ाव और महंगाई को दर्शाती हैं। इस लिहाज से देखें तो जुलाई की तुलना में अगस्त में खाद्य उत्पादों, फल और सब्जियों सहित पेय पदार्थों, औषधीय रसायन और वनस्पति उत्पादों जैसे तमाम सामानों की कीमतों में वृद्धि दर्ज की गई।

खासतौर पर खाने-पीने की वस्तुओं की खुदरा कीमतों में जिस कदर तेजी बनी हुई है, वह चिंताजनक है। अगस्त में खाद्य वस्तुओं की मुद्र्रास्फीति 3.84 फीसद रही। अंदाजा लगाया जा सकता है कि महंगाई की मार झेलते आम लोगों के सामने दिनोंदिन कैसी चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

हालांकि वैश्विक महामारी के संक्रमण की रोकथाम के मद्देनजर लगाई गई पूर्णबंदी के बाद से ही बाजार में वैसे भी वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा की वजह से महंगाई ने अपना असर दिखाया। फिर जब चरणबद्ध तरीके से पूर्णबंदी में राहत दी गई, तब बाजार में थोड़ी गतिविधियां शुरू हुईं और सामानों की आपूर्ति में सहजता आई। तब यह उम्मीद की गई थी कि वस्तुओं की आपूर्ति सामान्य होने के बाद कीमतों में गिरावट आएगी।

आम लोगों की पहुंच के लिहाज से देखें तो जून और जुलाई में स्थिति बहुत संतोषजनक तो नहीं रही, लेकिन अनिवार्य चीजों की खपत चलती रही। लेकिन बाजार में गतिविधियां बढ़ने के साथ-साथ महंगाई की दर में भी इजाफा होता गया। न केवल खाने-पीने के सामान, बल्कि परिवहन उपकरणों सहित दूसरी तमाम वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि दर्ज की गई।

खाद्य वस्तुओं में खासतौर पर सब्जियों की कीमतों में जिस तेजी से बढ़ोतरी शुरू हुई, वह अप्रत्याशित है। हरी सब्जियों की कीमतें बहुत सारे लोगों की पहुंच से बाहर हो रही हैं और जो आलू लोगों की थाली का सहारा रहा है, वह भी अब बेलगाम होता जा रहा है। ताजा आंकड़ों में आलू की कीमतों में करीब तिरासी फीसद बढ़ोतरी हुई है।

यह स्थिति तब है जब अगस्त में कच्चे तेल की कीमतों में 17.44 फीसद की गिरावट आई। माना जाता है कि तेल की कीमतों में कमी होने से वस्तुओं की माल ढुलाई का खर्च कम होता है और इससे कीमतें गिरती हैं। विडंबना यह है कि हमारे यहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव का हवाला देकर तेल की कीमतों में बढ़ोतरी तो कर दी जाती है, लेकिन उसमें गिरावट के मुताबिक कमी नहीं की जाती।

यह ध्यान रखने की जरूरत है कि महामारी के दौरान लागू पूर्णबंदी की वजह से पहले ही लोगों के रोजगार और आमदनी पर बहुत नकारात्मक असर पड़ा है। भारी तादाद में नौकरियां जाने और व्यवसायों के ठप होने के चलते लोग अपने खर्च में कटौती करने पर मजबूर हुए हैं। क्रयशक्ति बेहद कम हो जाने की वजह से वे सिर्फ अनिवार्य खरीदारी ही कर पा रहे हैं और दूसरे तमाम सामानों की बिक्री में गिरावट देखी जा रही है।

जाहिर है, अगर रोजी-रोजगार और आय में बढ़ोतरी के मद्देनजर सरकार की ओर से जल्दी ही कोई ठोस पहलकदमी नहीं हुई तो इसका असर वित्तीय और मौद्र्रिक नीतियों पर भी पड़ेगा, क्योंकि सरकार इससे संबंधित फैसले थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई दर के हिसाब से भी करती है।

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