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संपादकीय: चुनौती का सामना

यूपीए सरकार के दौरान 2013 में खाद्य सुरक्षा कानून बनने के बाद देश की दो-तिहाई आबादी को दो रुपए किलो गेहूं और तीन रुपए किलो चावल प्रति व्यक्ति के हिसाब से पांच किलो अनाज हर माह देने की व्यवस्था की गई थी। अब मौजूदा सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत जरूरतमंदों को मुफ्त अनाज मुहैया कराने की योजना कुछ समय के लिए जारी रखती है तो निश्चित रूप से यह अभाव से लड़ते लोगों की एक अतिरिक्त और बड़ी मदद होगी।

Author Published on: July 2, 2020 2:53 AM
Coronavirus, Migrant Labours, PMGKAYकेंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना को नवंबर तक के लिए बढ़ा दिया है। (फोटो- PTI)

महामारी से उपजे संकट के दौर में कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकना अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। लेकिन इससे बचाव के लिए अपनाए गए जरूरी उपायों की वजह से गरीब तबकों के लोगों के सामने जिस तरह जिंदा रह पाने लायक भोजन जुटाना भी मुश्किल हो गया है, उसमें सरकार की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह इस समस्या का कोई ठोस हल निकाले।

मार्च महीने में जब पूर्णबंदी लागू की गई, तभी से सबसे बड़ी चिंता यही सामने थी कि जिन लोगों के खाने-पीने की निर्भरता ही रोजाना की मजदूरी या दिहाड़ी पर टिकी थी, वे कैसे खुद को बचाएंगे। इस समस्या का दायरा शहरों-महानगरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक अब भी बना हुआ है। रोजी-रोटी या रोजगार के अभाव में ऐसे तमाम लोग हैं, जो किसी मदद के बूते अपना वक्त काट रहे हैं।

हालांकि अप्रैल महीने से सरकार ने मुफ्त अनाज मुहैया कराने की व्यवस्था की और इसकी वजह से बहुत सारे लोगों को तात्कालिक राहत मिली। लेकिन अब खुलने की ओर बढ़ चली पूर्णबंदी का दौर जैसे-जैसे लंबा खिंचता जा रहा है, उसमें अभाव से जूझ रहे लोगों के सामने संकट गहराता जा रहा है।

इसी के मद्देनजर मंगलवार को प्रधानमंत्री ने देश के नाम अपने संबोधन में एक बड़ी घोषणा यह की कि मुफ्त अनाज वितरण की योजना अब अगले पांच महीने यानी नवंबर तक और जारी रहेगी। इसके तहत करीब अस्सी करोड़ लोगों को पांच किलो गेहूं या चावल और साथ में एक किलो चना दिया जाएगा, ताकि कोई रोजगार या मजदूरी का काम नहीं मिलने की स्थिति में उनके सामने भूखे रहने की नौबत नहीं आए।

इस घोषणा से यह संकेत भी उभर रहा है कि कोरोना महामारी की वजह से लागू पूर्णबंदी अब देश के अलग-अलग राज्यों में चरणबद्ध तरीके से खुलने की ओर जरूर बढ़ रही है, लेकिन उसके असर की वजह से रोजी-रोजगार की स्थिति में फिलहाल कोई बड़ा बदलाव नहीं आने जा रहा है। अगर यह हालत बनी रहती है तो सबसे बड़ी मुश्किल उन लोगों के सामने होगी, जो पहले ही काम-धंधे पूरी तरह ठप होने के चलते आर्थिक रूप से पूरी तरह लाचार हो चुके हैं और उनके पास अपना और अपने परिवार का पेट भरने तक के लिए पैसे या अनाज नहीं हैं।

हालांकि यूपीए सरकार के दौरान 2013 में खाद्य सुरक्षा कानून बनने के बाद देश की दो-तिहाई आबादी को दो रुपए किलो गेहूं और तीन रुपए किलो चावल प्रति व्यक्ति के हिसाब से पांच किलो अनाज हर माह देने की व्यवस्था की गई थी। अब मौजूदा सरकार प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत जरूरतमंदों को मुफ्त अनाज मुहैया कराने की योजना कुछ समय के लिए जारी रखती है तो निश्चित रूप से यह अभाव से लड़ते लोगों की एक अतिरिक्त और बड़ी मदद होगी।

मगर चावल या गेहूं के सहारे पोषण और सेहत की तस्वीर क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इसलिए अगर इसके साथ दालें और खाने-पीने की दूसरी जरूरी चीजें भी दी जातीं तो बेहतर होता। इसके अलावा, यह भी देखने की जरूरत है कि मुफ्त अनाज की योजना और खाद्य सुरक्षा कानून के तहत मिलने वाले अनाज की सुविधा के दायरे से अगर राशन कार्ड या जरूरी दस्तावेजों के अभाव की वजह से प्रवासी मजदूर या कुछ दूसरे लोग छूट रहे हैं, तो फिलहाल उन्हें भी मदद पहुंचाई जाए।

हर साल काफी मात्रा में अनाज के सड़ कर बर्बाद हो जाने की खबरें आती रहती हैं। ऐसे में सरकार की यह जिम्मेदारी भी बनती है कि जब तक देश भर में काम-धंधे या रोजगार पूरी तरह ठप हैं, तब तक लोगों के सामने भूखे रहने की नौबत न आए।

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