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भ्रम के पांव

टीकाकरण अभियान की शुरुआत से ही कुछ लोग भारत में बने दोनों टीकों को लेकर भ्रम फैलाने का प्रयास करते देखे गए। उनमें कुछ विपक्षी दलों ने भी खुल कर सार्वजनिक मंचों से इनके प्रभाव को संदिग्ध करार दिया।

भारत में पहली बार कोरोना विषाणु का बी.1.617 स्वरूप अक्टूबर 2020 में रिपोर्ट किए गए थे। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

टीकाकरण अभियान की शुरुआत से ही कुछ लोग भारत में बने दोनों टीकों को लेकर भ्रम फैलाने का प्रयास करते देखे गए। उनमें कुछ विपक्षी दलों ने भी खुल कर सार्वजनिक मंचों से इनके प्रभाव को संदिग्ध करार दिया। उसका नतीजा यह हुआ कि पहले चरण में जिन चिकित्सा कर्मियों और इस महामारी से निपटने में अगली धार पर काम करने वाले लोगों ने टीका लगवाने के लिए पंजीकरण कराया था, उनमें से भी बहुतों ने कदम वापस खींच लिए।

इस तरह अनेक टीकाकरण केंद्रों पर टीकों की काफी खुराक बर्बाद चली गई। मगर जब कोरोना की दूसरी लहर आई और वह ज्यादा खतरनाक साबित हुई तो लोगों को टीकाकरण का महत्त्व समझ में आया और केंद्रों पर भीड़ उमड़नी शुरू हो गई। तमाम विशेषज्ञ संक्रमण से बचने के लिए कोरोनारोधी टीके लगवाने पर जोर देते रहे। तब विपक्षी दलों ने टीकों की कमी का मुद्दा उठा कर सरकार पर निशाना साधने का प्रयास किया। अब जब दूसरे देशों से टीकों की खुराक मंगा कर पूरे देश में टीकाकरण अभियान में तेजी लाई जा रही है, तब भी बहुत सारे लोगों में टीका लगवाने को लेकर हिचक और भ्रम बना हुआ है।

दरअसल, टीकाकरण के शुरुआती दिनों में ही लोगों के मन में जो भ्रम बिठा दिया गया, वह अभी दूर नहीं हुआ है। यही वजह है कि बार-बार केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को लोगों को भरोसा दिलाना पड़ रहा है कि टीके सुरक्षित हैं और उनका सेहत पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। कई जगह राज्य सरकारों को टीकाकरण अभियान को सफल बनाने के लिए सरकारी कर्मचारियों पर कुछ कड़ी शर्तें भी थोपनी पड़ी हैं। फिर भी लोगों में अपेक्षित उत्साह नहीं दिखाई दे रहा। जिन दिनों कोरोना संक्रमण पर काबू पाना सरकारों के लिए मुश्किल साबित हो रहा था, उस दौरान भी अनेक जगहों पर टीकाकरण दलों को देख कर लोग गांव छोड़ कर भागते देखे गए, कई जगह टीकाकरण दल पर हमले की खबरें भी आर्इं।

इन सबके पीछे शुरुआती चरण में ही टीकों को लेकर फैला दिया गया भ्रम काम कर रहा है। तब कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने टीकों के प्रभाव को ही संदिग्ध बना दिया था। कोवैक्सीन में शामिल तत्त्वों को लेकर भी भ्रम फैलाए गए। दोनों टीकों के अंतिम परीक्षण के दौर से न गुजरने को लेकर भ्रम फैलाए गए। भ्रम के पांव बड़े चपल होते हैं, हमारे समाज में एक भ्रम फैल जाए, तो उससे जुड़े कई भ्रम अपने आप पैदा होने लगते हैं। खासकर दूर-दराज गांवों के कम पढ़े-लिखे लोगों में सेहत आदि को लेकर ऐसे भ्रम बहुत जल्दी अपनी जकड़बंदी बना लेते हैं।

विचित्र है कि जब पूरी दुनिया के चिकित्सा विज्ञानी मान चुके हैं कि कोरोना संक्रमण से लड़ने का एकमात्र उपाय है शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना और वह टीकाकरण के जरिए ही संभव है, तब भी टीकों को लेकर लोगों का भ्रम दूर नहीं हो रहा। यह भी साफ हो गया है कि जिन लोगों ने टीकों की दोनों खुराक ले ली थी, उन्हें दूसरी लहर का प्रकोप कम परेशान कर पाया। गनीमत है कि दूसरी लहर पर भी काबू पा लिया गया है, पर तीसरी लहर की आशंका अभी समाप्त नहीं हुई है और उसके ज्यादा खतरनाक रूप में उभरने को लेकर चिंता जताई जा रही है। ऐसे में जो लोग अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए लोगों में टीकाकरण को लेकर भ्रम पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं, उन्हें तार्किक ढंग से सोचने और मानवीय तकाजों के मद्देनजर अपना नजरिया बदलने की जरूरत है।

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