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बेमानी विरोध

जहां तक तवांग पर चीन की नजर का सवाल है, अब तक विवाद का मुख्य बिंदु एक तरह से यही रहा है।

Author April 6, 2017 04:43 am
बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा की तस्वीर

भारत में तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा की गतिविधियां हमेशा से चीन के लिए आपत्ति का विषय रही हैं और इस मसले पर दोनों देशों के संबंधों में अक्सर तल्खी भी आ जाती है। इसी कड़ी में एक बार फिर दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश की प्रस्तावित यात्रा को लेकर चीन ने यहां तक कह दिया कि इससे द्विपक्षीय संबंधों को ‘गंभीर क्षति’ हो सकती है। भारत को तिब्बत के मुद्दे पर अपने ‘राजनीतिक संकल्पों’ का सम्मान करने की सलाह देते हुए चीन ने चेतावनी दी कि वह या तो दलाई लामा या फिर हम, एक को चुन ले! अंदाजा लगाया जा सकता है कि दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश यात्रा के मुद्दे पर चीन किस हद तक संवेदनशील है।

मगर सवाल है कि अपने संप्रभु क्षेत्र में भारत कैसे और क्या करेगा, यह किसी दूसरे देश को तय करने या फिर इस पर राय देने का अधिकार कैसे है! चीन-भारत सीमा के पूर्वी हिस्से पर चीन लगातार अपना दावा जताता रहा है। खासकर अरुणाचल प्रदेश और मठ नगर तवांग को वह दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा कहता है, जहां इस बार दलाई लामा की यात्रा प्रस्तावित है। जबकि भारत ने हर बार चीन के इस दावे को खारिज किया है। ऐसा नहीं कि दलाई लामा की यह कोई पहली अरुणाचल यात्रा है। 2009 में यूपीए सरकार के दौरान भी उन्हें वहां जाने की इजाजत मिली थी। दरअसल, 1959 में जब दलाई लामा ने भारत को अपना ठिकाना बनाया था, तभी से उन्होंने चीन का विरोध जारी रखा है। हालांकि भारत ने इस तिब्बती धर्मगुरु को इस हिदायत के साथ हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में शरण दे दी थी कि वे किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे।

लेकिन जिस तरह दलाई लामा अक्सर तिब्बत की आजादी का सवाल उठाते रहे हैं, उससे चीन ने उन्हें और भारत में उनकी गतिविधियों को हमेशा शक की नजर से देखा है। लेकिन दलाई लामा के सवाल से इतर सच यह है कि पिछले काफी समय से चीन और भारत के संबंधों में जिस तरह के उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, उसमें दोनों तरफ से इसे सहज बनाए रखने के लिए अलग से कोशिश की जाती है। आर्थिक मोर्चे पर बनी सहमतियों से कई बार ऐसा लगता है कि दोनों देशों के बीच आग्रहों की बर्फ पिघल रही है। लेकिन विवाद के कई बिंदुओं के बीच कोई ऐसा मामला सामने आ जाता है, जिससे अचानक फिर सब कुछ असहज हो जाता है। जहां तक तवांग पर चीन की नजर का सवाल है, अब तक विवाद का मुख्य बिंदु एक तरह से यही रहा है।

दोनों देशों के बीच सोलह दौर की वार्ताओं के बावजूद सीमा रेखा पर बने इस गतिरोध के मसले पर कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। बल्कि चीन ने जब इस समस्या को खत्म करने के लिए भारत से तवांग क्षेत्र को देने और बदले में पश्चिमी सीमा का कोई भूखंड ले लेने की बात कही, तो स्वाभाविक ही भारत ने इस शर्त को खारिज कर दिया और उसका बातचीत पर भी विपरीत असर पड़ा। सवाल है कि भारत अपनी सीमा में बिना किसी को नुकसान पहुंचाए क्या कर रहा है, इससे चीन को परेशान क्यों होना चाहिए! जब भारत साफ तौर पर ‘एक चीन’ की नीति का सम्मान करने की बात कहता रहा है, तो क्या चीन को भी भारत की संप्रभुता का खयाल नहीं रखना चाहिए?

दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा का चीन ने किया विरोध; कहा- "दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को होगा नुकसान"

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