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संपादकीय: संकट और मदद

कोरोना से जंग के लिए आने वाले दिनों में काफी ज्यादा पैसे की जरूरत पड़ेगी। इस संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री की पहल पर इस दिशा में बढ़ा गया और सोमवार को कैबिनेट ने इसे हरी झंडी दे दी। यह कटौती तत्काल प्रभाव यानी एक अप्रैल से लागू होगी। सांसदों और मंत्रियों के अलावा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और कई राज्यों के राज्यपाल भी अपने वेतन का तीस फीसद हिस्सा कोरोना के लिए देंगे।

Author Published on: April 7, 2020 6:23 AM
भारतीय संसद। (फाइल फोटो)

कोरोना महामारी से निपटने के लिए पैसा जुटाने के मकसद से केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री, मंत्रियों और सांसदों के वेतन में एक साल के लिए तीस फीसद की कटौती करने और सांसद निधि को दो साल के लिए निलंबित करने का जो फैसला किया है, वह स्वागतयोग्य कदम है। अभी सरकार के सामने सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि इस महामारी से लोगों के बचाने के लिए पैसा कहां से आएगा। सरकार की माली हालत पहले से ही खराब है, ऐसे में देश के सामने अचानक यह बड़ी विपत्ति भी आ गई, जिससे उबरने में लंबा वक्त लग सकता है और लाखों करोड़ रुपए का खर्च अलग से।

फौरी मदद के तौर पर सरकार ने पिछले दिनों पौने दो लाख करोड़ रुपए का पैकेज जारी किया। हालांकि इसे कहीं से भी पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। जाहिर है, कोरोना से जंग के लिए आने वाले दिनों में काफी ज्यादा पैसे की जरूरत पड़ेगी। इस संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री की पहल पर इस दिशा में बढ़ा गया और सोमवार को कैबिनेट ने इसे हरी झंडी दे दी। यह कटौती तत्काल प्रभाव यानी एक अप्रैल से लागू होगी। सांसदों और मंत्रियों के अलावा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और कई राज्यों के राज्यपाल भी अपने वेतन का तीस फीसद हिस्सा कोरोना के लिए देंगे।

कोरोना का संकट मामूली नहीं है। आज देश में स्वास्थ्य सेवाएं जिस हाल में हैं, उनके भरोसे इस महामारी का मुकाबला कर पाना संभव नहीं है। अभी सबसे पहली और तात्कालिक जरूरत कोरोना संक्रमितों के इलाज में लगे डाक्टरों और चिकित्साकर्मियों को उनकी सुरक्षा के जरूरी सामान और उपकरण, मास्क और आवश्यक दवाइयां और वेंटिलेटर जैसे जीवनरक्षक यंत्र उपलब्ध कराने की है। व्यापक स्तर पर कोरोना की जांच का अभियान चलाया जाना है, ताकि संदिग्ध मरीजों का पता लगा कर उन्हें अलग किया जा सके और उपचार दिया सके। कोरोना की जांच के लिए प्रयोगशालाओं की कमी है।

भारत की आबादी की तुलना में जांच के किट अपर्याप्त हैं। इसलिए अभी भारत में बड़े स्तर पर लोगों की जांच का काम शुरू नहीं हो पाया है। कई राज्यों में तो हालात इतने खराब हैं कि एक ही मास्क से चिकित्साकर्मियों को कई दिन तक काम चलाना पड़ रहा है। ऐसे में अगर कोरोना से लड़ने में पैसे की कमी बाधा बनी तो यह महामारी भयानक रूप धारण कर सकती है।

इसमें कोई शक नहीं कि देश के समक्ष संकट को देखते हुए बड़ी संख्या में उद्योगपति, फिल्म और खेल जगत की हस्तियां, कारपोरेट क्षेत्र, सामाजिक संस्थाएं सब साथ आए हैं और अपनी क्षमता के अनुरूप सरकार के कोष को भर रहे हैं। सबका मकसद सिर्फ यही है कि महामारी को फैलने से रोका जाए और देश जल्द ही इस संकट से उबरे। राजस्थान, महाराष्ट्र, तेलंगाना, ओड़ीशा जैसे राज्य भी अपने यहां इस तरह के कदम उठा चुके हैं। राजस्थान सरकार ने अपने मंत्रियों और विधायकों को पचहत्तर फीसद तक और कर्मचारियों को आधा वेतन देने का फैसला किया है।

महाराष्ट्र और तेलंगाना ने भी इसी तरह की कटौती का फैसला किया है। राज्यों को अपने स्तर आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए विधायक निधि को भी कुछ समय के लिए स्थगित करने का फैसला करना चाहिए। अगर देश की सभी राज्य सरकारें ऐसा कल्याणकारी कदम उठाएं तो इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना से निपटने के लिए बड़ा कोष बन जाएगा और भारत को किसी की मदद नहीं पड़ेगी।

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