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संपादकीयः असंतोष का आधार

अब भाजपा के सहयोगी दलों का असंतोष प्रकट होने लगा है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अध्यक्षता में सहयोगी दलों की हुई बैठक में अकाली दल और शिवसेना ने खुल कर अपनी नाराजगी जाहिर की।

Author February 11, 2016 3:18 AM
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह

अब भाजपा के सहयोगी दलों का असंतोष प्रकट होने लगा है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अध्यक्षता में सहयोगी दलों की हुई बैठक में अकाली दल और शिवसेना ने खुल कर अपनी नाराजगी जाहिर की। हालांकि भाजपा ने भरोसा दिलाया है कि गठबंधन में किसी तरह की दरार पैदा नहीं होने दी जाएगी, पर अकाली दल और शिवसेना की झल्लाहट छिपी नहीं है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद लगातार अनदेखी के चलते शिवसेना शुरू से भाजपा के खिलाफ खीझ प्रकट करती रही है। अब जैसे-जैसे पंजाब विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ रहा है, अकाली दल को भी भाजपा की कार्यशैली से परेशानी होने लगी है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना का सहारा लेकर अपना जनाधार बनाया था, मगर पिछले विधानसभा चुनावों में जैसे ही उसकी स्थिति मजबूत हुई, उसने जताना शुरू कर दिया कि वह अपने दम पर वहां चुनाव लड़ सकती है।

यही वजह है कि सरकार में शिवसेना को मनचाही जगह नहीं दी गई। वही स्थिति लगभग पंजाब में बनती दिख रही है। वहां भी भाजपा ने अकाली दल का दामन पकड़ कर अपनी जगह बनाई है। मगर अब बादल सरकार के खिलाफ लोगों में नाराजगी है। इसलिए भाजपा को लगने लगा है कि उसके साथ गठबंधन करके विधानसभा चुनाव लड़ने पर उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। फिर लोकसभा चुनावों में मिली कामयाबी से उसके हौसले बुलंद हैं और पंजाब में भी वह अकेले चुनाव लड़ने पर विचार कर रही है। स्वाभाविक ही इससे अकाली दल खुद को कमजोर स्थिति में पा रहा है।

अभी केंद्र में भाजपा के लिए घटक दलों को जोड़े रखना विवशता है, क्योंकि लोकसभा में भले वह मजबूत स्थिति में है, पर राज्यसभा में उनके बिना टिके रहना मुश्किल होगा। मगर लोकसभा में मतदाताओं के रुझान को देखते हुए और फिर हरियाणा विधानसभा में मिली शानदार जीत के बाद भाजपा को लगता है कि पंजाब में भी वह कामयाबी हासिल कर सकती है। फिर अब भी कांग्रेस के प्रति लोगों में विश्वास नहीं लौट पाया है, इसलिए उसे यह अपने माफिक अवसर जान पड़ता होगा। यों भी भाजपा ज्यादातर जगहों पर बिना गठबंधन के चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। मगर इससे सहयोगी दलों में उसके साथ बने रहने की इच्छाशक्ति कहां तक रह पाएगी, इस पर भी उसे विचार करने की जरूरत है। गठबंधन धर्म का निर्वाह ठीक से न हो तो कलह की सूरत बनती ही है।

शिवसेना ने याद भी दिलाया है कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने जिस तरह सहयोगी दलों के साथ गरिमापूर्ण तरीके से संबंधों का निर्वाह किया, वह अब नहीं दिखता। यह असंतोष केवल शिवसेना और अकाली दल की कमजोर होती राजनीतिक स्थिति से नहीं उपजा है। चंद्रबाबू नायडू और रामदास आठवले भी भाजपा अध्यक्ष की कार्यशैली से असुविधा महसूस कर रहे हैं। कम से कम जिन राज्यों में गठबंधन सरकार है, वहां सत्तासीन पार्टी से उम्मीद की जाती है कि सहयोगी दलों को भी सरकार के फैसलों में शरीक करे। मगर महाराष्ट्र में भाजपा ने शिवसेना को एक तरह से हाशिये पर डाल रखा है। फिलहाल भाजपा कुछ विधानसभा चुनावों में भले बेहतर प्रदर्शन कर ले, पर यही स्थिति सदा रहेगी, इसका दावा वह नहीं कर सकती। इसलिए उसके लिए संभल कर कदम उठाना ही बेहतर होगा

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