जय विजय

गुरुवार को तोक्यो ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने कांस्य पदक के लिए खेलते हुए जैसा जलवा बिखेरा, वह अब इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गया है।

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सांकेतिक फोटो।

गुरुवार को तोक्यो ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने कांस्य पदक के लिए खेलते हुए जैसा जलवा बिखेरा, वह अब इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो गया है। यानी भारत ने जर्मनी को चार के मुकाबले पांच गोल से हरा कर कांस्य पदक अपने नाम कर लिया। यों एक दौर में विश्व हॉकी में भारत ने अपने जीवट से अपनी बादशाहत कायम की थी और वह लंबे समय तक चली थी, लेकिन करीब चार दशक पहले मास्को ओलंपिक के बाद देश ने इस खेल में किसी बड़ी कामयाबी के जद्दोजहद में ही अपना वक्त गुजारा। अब तोक्यो ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने एक बार फिर जिस दमखम का प्रदर्शन किया, उसने इकतालीस साल के दौरान इस खेल में देश के सपनों और उम्मीदों को न सिर्फ लगभग पूरा किया, बल्कि एक नई और ऊंची उड़ान दे दी। यह जगजाहिर है कि पिछले चार-पांच दशकों से विश्व हॉकी में विश्व के कुछ देशों ने अपनी मजबूत पैठ बनाई है और माना जाने लगा था कि उनसे मुकाबले में पार पाना बेहद मुश्किल है। लेकिन भारतीय टीम ने साबित किया कि जीवट और जिजीविषा के जरिए खत्म होती उम्मीद को भी नई उड़ान दी जा सकती है।

दरअसल, हौसला साथ हो तो हाथ से छूटती बाजी भी झपट के थाम ली जा सकती है। हमारी टीम ने जर्मनी के साथ मैदान में जिस स्तर के खेल और संघर्ष का प्रदर्शन किया, उसे अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि माना जाना चाहिए। जर्मनी के साथ इस मैच की एक खूबसूरती यह रही कि किसी भी टीम के पक्ष में खेल एकतरफा नहीं हुआ और जीत के लिए जोरदार जद्दोजहद हुई। कई बार ऐसा जरूर लगा कि जर्मनी की टीम बाजी मार ले जाएगी। लेकिन हमारी टीम ने पूरे खेल के दौरान जर्मनी को रोका, हमलावर होकर हावी हुए और फिर मैच के बिल्कुल आखिरी पलों में भी अपने हौसले के बूते जीत को अपने नाम दर्ज कराया। कांस्य पदक हासिल करने के मुकाम तक पहुंचने के लिए खेले गए तमाम मैचों में टीम को कुछ उतार-चढ़ाव जरूर झेलने पड़े, फिर भी उसने हर बार अपने खेल के स्तर को विजेता के पैमाने पर ही बनाए रखा। यह बेवजह नहीं है कि सेमीफाइनल में स्वर्ण या रजत पदक हाथ से निकलने के बावजूद देश और दुनिया की निगाहें हमारी टीम की ओर टिकी हुई थीं।

यह जीत कई लिहाज से खूबसूरत कही जा सकती है और गर्व से भरने वाली है। एक समय इस खेल में हमारे देश का डंका बजता था, मगर लंबे समय से हर बार पदकों की दौड़ तक से बाहर होते रहने की वजह से आम लोगों की उम्मीदें धुंधली होने लगी थीं। जाहिर है, लगातार ठोस नतीजे हासिल नहीं होना दिलचस्पी कम कर देता है। लेकिन इसकी भी वजहें रहीं। एक ही समय में क्रिकेट को पर्याप्त बढ़ावा मिला और हॉकी या फुटबॉल जैसे खेलों को अपने भरोसे छोड़ दिया गया। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इस साल ओलंपिक तय होने के बावजूद बजट में खेलों के लिए दी जाने वाली राशि में दो सौ तीस करोड़ रुपए की कटौती कर दी गई। जबकि इन खेलों में देश के आम लोगों तक की स्वाभाविक दिलचस्पी रही है। खासतौर पर हॉकी और फुटबॉल में दूरदराज के इलाकों से जिन तबकों के खिलाड़ी उभरते हैं, उन्हें उचित प्रोत्साहन और प्रशिक्षण की जरूरत है। अगर सीमित सुविधाओं में हमारे खिलाड़ी ओलंपिक से इस बार जैसी अहम कामयाबी झटक कर अपनी झोली में ले आए, तो इसमें कोई शक नहीं कि स्तरीय प्रशिक्षण और प्रोत्साहन के बाद वे एक बार फिर शीर्ष पर अपने देश की जगह बना सकते हैं।

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