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संपादकीयः राहत का पाठ

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार फिलहाल अपनी बुलंदी के पंद्रह मिनट की चकाचौंध में हैं। कहना न होगा कि जल्द ही उन्हें अपने अंतर्मन में झांकने का समय मिलेगा।

Author March 14, 2016 02:47 am
कन्हैया कुमार

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार फिलहाल अपनी बुलंदी के पंद्रह मिनट की चकाचौंध में हैं। कहना न होगा कि जल्द ही उन्हें अपने अंतर्मन में झांकने का समय मिलेगा। चकाचौंध की दुनिया ही ऐसी है कि कैमरे, माइक जिधर भी घूम जाते हैं वहां कुछ क्षणों के लिए आसपास का सब कुछ अंधेरे में दफन हो जाता है। रोशनी की इस मीनार के नीचे अपनी मशहूरी का मगरूर इजहार करने वाले किसी आम आदमी या फिर देश के सर्वोच्च विश्वविद्यालय के छात्र का भी।

जनेवि में नारों की रात में जो भी हुआ वह बिल्कुल वैसा ही था जैसा कि ‘सक्रिय’ छात्रों से अपेक्षित था। और अगर ये सक्रिय छात्र ‘कामरेड’ भी हों तो लब से क्रांति के बोल निकलने ही हैं। एक खास विचारधारा से जुड़े छात्र से उसकी विचारधारा का प्रसार करने की ही अपेक्षा की जाती है (ध्यान रहे, यह बात राष्ट्रविरोधी नारों के संबंध में नहीं है)। अगर जनेवि परिसर में वामपंथी विचारधारा फलफूल रही है तो यहां दक्षिणपंथी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े नेता भी हैं और ‘धर्मनिरपेक्ष’ कांग्रेस से जुड़े छात्र संगठन एनएसयूआइ के नेता भी।

विश्वविद्यालय परिसर में जो गलती छात्र नेताओं (कन्हैया समेत) ने की वही गलती उनके खिलाफ कार्रवाई करके सरकार ने भी की। सरकार की गलती इसलिए बड़ी है कि छात्र फिर भी ‘छात्र’ ही तो हैं, कहकर छूट जाएंगे लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन या सरकार को यह छूट देना मुश्किल है। यही वजह है कि जनेवि में पुलिस कार्रवाई वहां लगे राष्ट्रविरोधी नारों से भी ज्यादा आलोचना का कारण बनी। और भी गंभीर इस मामले में की गई हड़बड़ी रही। परिसर के अंदर पुलिस कार्रवाई का अंदाज और समय भी सवालों के घेरे में है। जनेवि के पूर्व कुलपति योगेंद्र के अलघ ने हाल ही में अपने एक लेख में लिखा है कि अपने कार्यकाल में उन्होंने विश्वविद्यालय के बड़े से बड़े मसले परिसर के अंदर ही सुलझा लिये। यह महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ऐसा नहीं लगता कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस दिशा में पहले अपने स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई करने का प्रयास किया हो। बहरहाल, यहां तक तो लगभग सब ठीक ही था।

लेकिन प्रचंड बहुमत से देश की संसद पर काबिज और स्वसमर्पित राष्ट्रवाद की सर्वोच्च अलंबरदार भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने परिसर के एक कोने में हुई एक रैली पर जैसी कार्रवाई की, वह हैरतअंगेज रही। परिसर में लगे राष्ट्रविरोधी नारे जो जनेवि की हद या सोशल मीडिया की पहुंच तक ही रहते, उन्हें घर-घर पहुंचा दिया गया। केंद्रीय गृहमंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्री से लेकर पुलिस कमिश्नर बस्सी तक एक अदने से छात्र के खिलाफ हल्ला बोल बैठे। और इसका फायदा मिला विपक्ष को। जनेवि से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय तक के छात्र यह नहीं देख रहे थे कि कन्हैया लाल से जुड़ा है या भगवा से। उन तक यह संदेश गया कि हमारे छात्र प्रतिनिधि को पुलिस उठा कर ले गई। छात्रों और आम लोगों ने इसे जनतांत्रिकता पर हमले की तरह लिया और जिस तरह कन्हैया के समर्थन में आम लोग सड़क पर उतर पड़े उससे वाम दल भी हैरान थे।
प्रतिबद्ध विपक्ष को छोड़ दें तो दिल्ली से लेकर दूरदराज तक के आम नागरिक एक छात्र सभा के इस तरह का राष्ट्रविरोधी मोड़ लेने पर हैरान और क्रोधित ही थे। हर जगह पर हल्ला बोल करता ‘अल्ट्रा लेफ्ट’ बैकफुट पर था। लेकिन सरकार ने जिस तरह बचकाने तरीके से युवाओं पर लगाम लगाने की कोशिश की वह मामले को और उलझा गया। सरकार और उसके पक्षों की तरफ से जिस तरह ‘राष्टÑद्रोह’ पर हल्ला मचाया गया, उससे सबसे कमजोर ‘राष्टÑवाद’ ही हुआ।

बहरहाल, बात कन्हैया की और उसकी पंद्रह मिनट की बुलंदी की। कन्हैया में ऐसी युवा ऊर्जा और ताजगी है जो सबकोसहज ही आकर्षित करती है। उनके पास वाक्पटुता, हिंदी पट्टी के मुहावरे और हाव-भाव की ऐसी शैली है जो मीडिया की मंडी के लिए बिकाऊ थी। विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति कर रहे किसी भी नेता में आगे बढ़ने के जो गुण होने चाहिए, वे उनमें कूट-कूट कर भरे हैं। विश्वविद्यालय परिसर के अंदर सक्रिय एक छात्र के खिलाफ जिस तरह उच्च सत्ता बोली, उस पर अदालत परिसर में हमला हुआ वह उसे और बहादुर बना गया। शायद यही कारण था कि दिन में संसद में प्रधानमंत्री के ओजस्वी भाषण के बरक्स शाम को मीडिया की पहली पसंद कन्हैया था। यूं लगा जैसे पूरी सत्ता के विपक्ष में यह एक लड़का खड़ा है। और इस बार वह पूरी सतर्कता के साथ राष्टÑवाद के प्रतीकों को अपने पक्ष में ला चुका था। परिदृश्य में लहराता तिरंगा था, जुबां पर मोदी जी वाला ‘सत्यमेव जयते’। मीडिया के लिए यह पूरा टीआरपी बटोरू था। बाजार की भाषा में बात करें तो कन्हैया और राष्टÑवाद दोनों के शेयर अधिकतम उछाल पर थे।

लेकिन चढ़ते सूचकांक का धड़ाम से गिरना भी बाजार की नियति होती है। सरकार के हड़बड़ाहट भरे फैसले और मीडिया की सुर्खियों और टेलीविजन पर 24 गुणे 7 मौजूद रह कर भी आपकी बुलंदी क्षणिक हो सकती है। ‘अरब बसंत’ की तर्ज पर चले अण्णा आंदोलन के गर्भ से एक अरविंद केजरीवाल ही निकले जो दिल्ली तक महदूद होकर रह गए। हजारे जिस रफ्तार से आए थे, उसी रफ्तार से गए भी।
लेकिन कन्हैया में ऐसी ऊर्जा है, जो उन्हें इससे कहीं आगे ले जा सकती है। और तब उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती यही बाजार होगा। बाजार सिर्फ हिंदी पट्टी की गरीबी और विपन्नताओं को बेच सकता है, उनका समाधान नहीं निकाल सकता। और आगे की लड़ाई में तो कन्हैया के साथ सिर्फ पतझड़, बारिश और तूफान के थपेड़े होंगे। उम्मीद है, बसंत से बाहर जाकर भी वे हार नहीं मानेंगे।

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