परीक्षण और सवाल

उत्तर कोरिया ने नए साल में लगातार दो मिसाइल परीक्षण कर दुनिया को एक बार फिर चिंता में डाल दिया।

North Korea missile
प्रतीकात्मक तस्वीर(फोटो सोर्स: ट्विटर)।

उत्तर कोरिया ने नए साल में लगातार दो मिसाइल परीक्षण कर दुनिया को एक बार फिर चिंता में डाल दिया। पहले एक बैलिस्टिक मिसाइल और फिर एक हाइपरसोनिक मिसाइल दाग कर उत्तर कोरिया ने साफ कर दिया कि वह परमाणु हथियारों के विकास कार्यक्रम से पीछे हटने वाला नहीं है। हालांकि तमाम वैश्विक दबावों के बावजूद पिछले एक साल में उत्तर कोरिया लगातार मिसाइल परीक्षण करता रहा है। पिछले साल सितंबर में उसने पहली हाइपरसोनिक मिसाइल दाग कर सबको सकते में डाल दिया था।

खास बात यह है कि मंगलवार को किए गए दूसरे हाइपरसोनिक मिसाइल परीक्षण के वक्त देश के तानाशाह शासक किम जोंग उन खुद मौजूद थे। उनकी मौजूदगी अमेरिका जैसे देश के लिए एक कड़ा संदेश भी है। परमाणु हथियारों के परीक्षण के मुद्दे पर अमेरिकी चेतावनियों का किम उसी की भाषा में जवाब देते रहे हैं। हाल के परीक्षणों को किम ने ‘परमाणु युद्ध से बचाव’ का बड़ा कदम बताया है। उनके इस रुख से साफ है कि आने वाले दिनों में ऐसे और परीक्षण भी किए जा सकते हैं। दुनिया भले कोरोना महामारी से जूझ रही हो, लेकिन किम जोंग उन की प्राथमिकता देश की सेना को और उन्नत व ताकतवर बनाना है।

इसमें अब कोई संदेह नहीं कि उत्तर कोरिया एशियाई क्षेत्र की एक परमाणु शक्ति के रूप में उभर चुका है। परमाणु हथियारों का विकास उसका सबसे बड़ा राष्ट्रीय कार्यक्रम बन गया है। साल 2016 से 2018 के बीच ही उसने नब्बे से ज्यादा मिसाइल परीक्षण कर डाले थे। यह भी कोई छिपी बात नहीं है कि उसके इस अभियान को कामयाब बनाने में चीन परोक्ष रूप से बड़ी भूमिका निभा रहा है। उसे परमाणु हथियारों की तकनीक से लेकर साजोसामान तक मुहैया करवा रहा है।

वरना दशकों से उत्तर कोरिया के जो हालात हैं, उसमें वह तो खुद इतना कुछ कर नहीं पाता। गौरतलब है कि उत्तर कोरिया का विवाद दक्षिण कोरिया और जापान से है। ये दोनों देश अमेरिका समर्थक हैं। चीन से भी इनके विवाद जगजाहिर हैं। फिर, अमेरिका और चीन दो विरोधी ध्रुवों के तौर पर वैश्विक राजनीति में सामने आ चुके हैं। इसलिए भी चीन ने उत्तर कोरिया को खड़ा करने में दिलचस्पी और बढ़ाई है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तर कोरिया के परमाणु हथियार परीक्षण एक तरह से अमेरिका को चीन की भी चुनौती हैं।

दरअसल, परमाणु हथियारों के परीक्षण और निर्माण का मसला जितना संवेदनशील है, उतना ही विवादास्पद भी। हकीकत तो यह है कि आज जो देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं, वे दूसरे देशों को ऐसी सैन्य ताकत से संपन्न होते देख नहीं सकते। वे इसे अपने लिए बड़ा खतरा मानते हैं। इसीलिए परमाणु हथियारों की वैश्विक व्यवस्था पर भी चंद देशों का कब्जा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी इन्हीं का दबदबा है। परमाणु हथियारों की होड़ रोकने के लिए जो भी वैश्विक संधियां बनी हैं, उनमें भी कुछ खास देशों के हित नजर आते हैं।

सवाल तो इस बात का है कि क्यों अमेरिका या रूस को ही परमाणु हथियारों का जखीरा रखने का हक है और ईरान, उत्तर कोरिया या ऐसे ही दूसरे देशों को नहीं। इसीलिए कई देश चोरी-छिपे परमाणु हथियार हासिल करने या उनका निर्माण करने में लगे हैं। अपनी सुरक्षा के लिए हथियार बनाना और उनका परीक्षण करना तो सबका हक बनता है। अगर उत्तर कोरिया या ऐसे दूसरे देशों को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है तो इसके लिए दुनिया के सभी देशों को परमाणु हथियारों की एक तर्कसंगत नीति पर विचार करना होगा। वरना खतरा और बढ़ता जाएगा।

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