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संपादकीयः निराश अलगाववादी

कश्मीर में आतंकी संगठनों के खिलाफ सैन्य बलों के सघन तलाशी अभियान से अब आतंकवादी संगठनों में निराशा साफ नजर आने लगी है। शनिवार को शोपियां में सेना ने लश्करे-तैयबा के जिला कमांडर सहित सात दहशतगर्दों को मार गिराया, तो वहां के कुछ पत्थरबाज सक्रिय जरूर हुए, पर जल्द ही उन पर काबू पा लिया गया।

Author Updated: August 6, 2018 3:32 AM
अनुच्छेद 35 ए की समीक्षा को लेकर उन्होंने दो दिन के कश्मीर बंद का आह्वान कर दिया।

कश्मीर में आतंकी संगठनों के खिलाफ सैन्य बलों के सघन तलाशी अभियान से अब आतंकवादी संगठनों में निराशा साफ नजर आने लगी है। शनिवार को शोपियां में सेना ने लश्करे-तैयबा के जिला कमांडर सहित सात दहशतगर्दों को मार गिराया, तो वहां के कुछ पत्थरबाज सक्रिय जरूर हुए, पर जल्द ही उन पर काबू पा लिया गया। अब पहले की तरह सड़कों पर उतर कर सुरक्षा बलों के लिए चुनौती पेश करने की हिम्मत उनमें नहीं दिखाई देती। छिपी बात नहीं है कि अलगाववादी और आतंकी संगठनों के उकसाने पर ही स्थानीय युवक हाथों में पत्थर लेकर सड़कों पर उतर आते थे। आतंकवादियों के जनाजे में दी जाने वाली तकरीरों और सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो संदेशों से भी उन्हें गुमराह करने की कोशिश की जाती थी। पर अब मारे गए आतंकियों के जनाजे में भीड़ इकट्ठा होने पर लगाम लगा दी गई है। पिछले कुछ महीनों में आतंकवादियों पर कड़ी नजर रखी जाने लगी है, जिससे उनके हौसले पस्त नजर आते हैं। इसी का नतीजा है कि उन्होंने छुट्टी पर घर आए सेना और पुलिस के सिपाहियों को निशाना बनाना शुरू किया। अब अलगाववादियों ने कश्मीरी लोगों की भावनाएं भड़काने का एक नया मुद्दा तलाश लिया है। अनुच्छेद 35 ए की समीक्षा को लेकर उन्होंने दो दिन के कश्मीर बंद का आह्वान कर दिया।

अनुच्छेद 35 ए के तहत बाहरी लोगों के कश्मीर में बसने, जमीन-जायदाद खरीदने पर पाबंदी है। इसे सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका के जरिए चुनौती दी गई है। अलगाववादियों ने इस पर सुनवाई रोकने की मांग करते हुए दो दिन के पूर्ण कश्मीर बंद का आह्वान किया और स्थानीय लोगों को समझाना शुरू किया कि अगर कश्मीर में बाहरी लोगों का प्रवेश बढ़ेगा, तो वह वहां की संस्कृति और स्वायत्तता के लिए खतरा साबित होगा। यह एक तरह से सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को प्रभावित करने की भी कोशिश है। अलगाववादियों को कश्मीर बंद कराने और लोगों को भड़काने का बहाना चाहिए। इस मुद्दे पर अभी कोई फैसला नहीं आया है। पहले भी राजनीतिक दलों के बीच इस मसले पर विचार-विमर्श होता रहा है। मगर अलगाववादियों को किसी संवैधानिक प्रक्रिया में विश्वास नहीं है, इसलिए वे बेवजह किसी भी मुद्दे पर लोगों को भड़काना शुरू कर देते हैं। उन्होंने कभी कश्मीर की बुनियादी समस्याओं के समाधान के बारे में गंभीरता से विचार करने की जरूरत नहीं समझी। उन्हें लगता है कि कश्मीर को आजाद कर देने से सारी समस्याओं का हल हो जाएगा।

दरअसल, जबसे अलगाववादियों के सीमा पार से संबंधों पर कड़ी नजर रखी जाने लगी है, उनके बैंक खातों पर निगरानी बढ़ी है, तबसे उनकी हताशा लगातार बढ़ती गई है। फिर दहशतगर्दों पर नकेल कसने से उन्हें लगता है कि वे स्थानीय को अपने मुद्दों से जोड़े रखने में कमजोर पड़ते जाएंगे। अलगाववादी संगठन भारतीय जनतांत्रिक व्यवस्था में यकीन नहीं करते, वे चुनाव प्रक्रिया में कभी हिस्सा नहीं लेते। उनका एक ही नारा है, कश्मीर की आजादी। वे लोगों को समझाते रहे हैं कि जब तक कश्मीर भारत का हिस्सा रहेगा, तब तक वहां के लोगों की तरक्की और खुशहाली संभव नहीं है। मगर सच्चाई यह है कि अगर बाहरी लोगों के लिए वहां रहने और कारोबार करने का रास्ता खुलेगा, तो स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। इस वक्त कश्मीरी लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करना बड़ी चुनौती है। पर इससे अलगाववादियों की स्थिति कमजोर होगी, जिसे वे किसी भी हालत में होने नहीं देना चाहते।

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