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संपादकीय: आतंक का सिलसिला

यह किसी से छिपा नहीं है कि सीमा पार के ठिकानों से अपनी गतिविधियां संचालित करने वाले आतंकवादी संगठनों को पाकिस्तानी सेना का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग मिलता रहा है। एक ओर पाकिस्तानी सेना की तरफ से बेवजह ही संघर्ष-विराम का उल्लंघन कर गोलीबारी कर दी जाती है, तो दूसरी ओर आतंकी संगठनों के जरिए भारतीय सुरक्षा बलों पर इसी तरह के हमले करवाए जाते हैं।

पुलवामा हमला के बाद अवंतीपोरा विस्फोट स्थल के पास मौजूद सुरक्षाकर्मी। (इंडियन एक्सप्रेस फोटो – शुएब मसूदी)

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में सोमवार को हुए आतंकी हमले से यह साफ है कि उस समूचे इलाके में आतंकवादियों के असर को अभी पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका है। यों पिछले कुछ महीनों के दौरान बरती गई सख्ती और चौकसी की वजह से आतंकी संगठनों के लिए अपनी मंशा को अंजाम देना इतना आसान नहीं रह गया है। शायद इसी हताशा में आतंकवादी अब घात लगा कर हमला करने लगे हैं।

गौरतलब है कि पुलवामा के पंपोर के कांधीजल ब्रिज पर सीआरपीएफ की एक बटालियन और जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवान तैनात थे, तभी आतंकियों ने अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। अचानक हुए इस हमले में सुरक्षा बलों को संभलने का मौका नहीं मिला और आखिर दो जवान शहीद और तीन घायल हो गए। पिछले कुछ हफ्ते के दौरान सघन चौकसी वाले इस इलाके में सुरक्षा बलों पर यह चौथा हमला है। इस घटना से फिर यही जाहिर होता है कि कई बड़े आतंकियों के मारे जाने या उनकी गिरफ्तारी के बावजूद उस इलाके में किसी न किसी रूप में उनकी मौजूदगी कायम है।

हालांकि अब वे पहले की तरह प्रत्यक्ष रूप से आम आबादी को बहलाने में कामयाब नहीं हो पाते हैं, लेकिन यह भी साफ है कि इक्का-दुक्का स्थानीय लोगों के सहयोग या मिलीभगत की वजह से आतंकी ऐसा हमला करने में कामयाब हो जाते हैं। जाहिर है, वक्त के साथ आतंकवादी संगठनों और उनके सदस्यों ने भी अपनी रणनीति बदली है। इस पहलू को हमारे सुरक्षा बल और खुफिया एजेंसियां समझती हैं। लेकिन विडंबना यह है कि कई बार एक साथ कई मोर्चों पर उलझे रहने की स्थिति में आतंकी ऐसा हमला करते हैं।

सोमवार को आतंकियों का हमला और उसमें दो जवानों की शहादत इसी तरह के अचानक पैदा हुए हालात का नतीजा हैं। लेकिन यह भी सही है कि पिछले कुछ महीनों के दौरान लगातार स्थानीय पुलिस, खुफिया तंत्र और सुरक्षा बलों के बीच आपसी तालमेल और सूचनाओं के वक्त पर आदान-प्रदान होने की वजह से कई आतंकियों को पकड़ने या फिर उन्हें मार गिराने में कामयाबी मिली है और यही वजह है कि अब आतंकी संगठनों को पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

यह किसी से छिपा नहीं है कि सीमा पार के ठिकानों से अपनी गतिविधियां संचालित करने वाले आतंकवादी संगठनों को पाकिस्तानी सेना का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग मिलता रहा है। एक ओर पाकिस्तानी सेना की तरफ से बेवजह ही संघर्ष-विराम का उल्लंघन कर गोलीबारी कर दी जाती है, तो दूसरी ओर आतंकी संगठनों के जरिए भारतीय सुरक्षा बलों पर इसी तरह के हमले करवाए जाते हैं। अब ऐसी हरकतें वैश्विक समुदाय की नजर में भी आ चुकी हैं। अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को इसके लिए फजीहत भी झेलनी पड़ती है।

मसलन, चीन में हुए नौवें ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणा-पत्र में पाकिस्तान की जमीन से आतंक फैलाने वाले लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान और हक्कानी नेटवर्ट आदि संगठनों का नाम लेकर इनकी आलोचना की गई थी। विडंबना यह है कि दुनिया भर में अपने असली चेहरे का खुलासा होने के बावजूद आतंकी संगठन और उन्हें संरक्षण देने वाले देशों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि आतंकवाद ऐसी आग है, जिससे भले ही कुछ समय तक दूसरे देशों को परेशान किया जा सकता है, लेकिन फिर उसके संरक्षकों को भी उसमें झुलसना पड़ता है।

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