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आतंक का सिरा

यह जगजाहिर तथ्य है कि मादक पदार्थों की तस्करी का आतंकवाद से क्या रिश्ता है और इसने कैसे इससे निपटने के प्रशासनिक उपायों से लेकर सामाजिक उपचारों तक को जटिल बनाया है। फिर भी नशीले पदार्थों के कारोबार में लिप्त गिरोहों और उनके तंत्र को ध्वस्त करना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में प्राथमिकता नहीं पा […]

Author नई दिल्ली | April 22, 2016 2:54 AM
संयुक्त राष्ट्र। (फोटो-रॉयटर्स)

यह जगजाहिर तथ्य है कि मादक पदार्थों की तस्करी का आतंकवाद से क्या रिश्ता है और इसने कैसे इससे निपटने के प्रशासनिक उपायों से लेकर सामाजिक उपचारों तक को जटिल बनाया है। फिर भी नशीले पदार्थों के कारोबार में लिप्त गिरोहों और उनके तंत्र को ध्वस्त करना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में प्राथमिकता नहीं पा सका है। हालांकि इन दोनों गतिविधियों के बीच अभिन्न संबंध होने पर लंबे समय से वैश्विक स्तर पर चिंता जताई जाती रही है। इसी क्रम में बुधवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के एक विशेष सत्र को संबोधित करते हुए वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि नशीले पदार्थों की तस्करी और आतंकी तंत्र का बढ़ता गठजोड़ विभिन्न क्षेत्रों की शांति, सुरक्षा और स्थिरता को खतरे में डालता है। इसी के मद्देनजर उन्होंने वैश्विक समुदाय से अपील की कि वह इसके खिलाफ अपनी साझा लड़ाई को सख्त करते हुए इनके वित्तपोषण को अवरुद्ध कर दे।

गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र ने नशीले पदार्थों की वैश्विक समस्या से निपटने के लिए एक नए मसविदे को स्वीकार किया है, जिसे पिछले महीने कमीशन ऑन नारकोटिक ड्रग्स ने विएना में तैयार किया था। दरअसल, आतंकियों ने मादक पदार्थों के कारोबार को पैसा जुटाने का अपना सबसे अहम जरिया बना लिया है। इस तरह सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हुई हैं। यों, नशीले पदार्थों के तस्करों के तार दुनिया भर के गिरोहों से जुड़े हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की वर्ल्ड ड्रग्स रिपोर्ट 2011 के मुताबिक समूचे दक्षिण एशिया में भारत मादक पदार्थों का सबसे बड़ा बाजार है। सवाल है कि अफगानिस्तान से चल कर पाकिस्तान के रास्ते भारत में पहुंचने वाले मादक पदार्थों पर काबू पाना हमारे देश के लिए मुश्किल क्यों बना हुआ है, जबकि पाकिस्तान की सीमा से जुड़ी हर गतिविधि पर सख्त निगरानी होने का दावा किया जाता रहा है।

हैरानी की बात यह भी है कि अपने सूक्ष्म निगरानी तंत्र के बूते आतंकवादियों के तमाम ठिकानों की खोज कर लेने और कार्रवाई कर उन्हें नष्ट करने में कई बार कामयाब रहे देश आज भी मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े उनके तार को छिन्न-भिन्न कर पाने में नाकाम रहे हैं। इसमें कई बार किसी खास देश में कुछ मादक पदार्थों के विधिसम्मत उत्पादन की स्थिति भी बाधक बनती है। मसलन, भारत एक हद तक कानूनी तौर पर अफीम का उत्पादन और निद्रा लाने वाली दवा के कच्चे मादक पदार्थ की आपूर्ति करता है। हालांकि जेटली ने यह जरूर कहा है कि भारत इससे जुड़े निषेधात्मक और प्रवर्तन उपायों को लागू करने से जुड़ी अपनी जिम्मेदारी से ‘पूरी तरह अवगत’ है, लेकिन हमारे देश में निगरानी तंत्र की सीमाओं से लेकर नियम-कायदों पर अमल करने में संबंधित महकमों की जो हालत रही है, उसमें सरकार की यह जिम्मेदारी किस हद तक पूरी होती होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कहीं भी कोई बड़ी आतंकी वारदात होती है तो संबंधित देश से लेकर दुनिया भर में चिंता की लहर दौड़ जाती है। इससे निपटने के लिए तमाम उपायों की घोषणा दोहराई जाती है, लेकिन आतंकवाद पर काबू पाने के लिए न तो उसकी जड़ों पर चोट की जाती है, न कोई दीर्घकालिक योजना सामने आती है। यही वजह है कि आतंकवाद के खिलाफ तमाम कवायदें एक तात्कालिक औपचारिकता बन कर रह जाती हैं, जबकि जरूरत ठोस पहल की है।

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